GITA : Vishwa Samuday Ka Jiwan Shastra; by Ramesh Nayyar

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Gita, Vishwa Samuday, Jiwan Shastra,  Ramesh Nayyar,  Rastriya Ekta Book , Hindi Book

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गीता: विष्व समुदाय का जीवन-षास्त्र

1 गीता को फिर राजनीति के दलदल में घसीटने का प्रयास किया गया। पहले भी भगवत् गीता को लेकर रूस सहित कुछ अन्य समाजों के लेखकों  द्वारा अनावष्यक विवाद उछाला गया। वस्तुतः ये विवाद कुछ लेखकों और संगठनों ने खुद को चर्चा में लाने के मकसद से उछाले थे। सच तो यह है कि गीता को किसी पंथ विषेश के धर्म ग्रंथ के दायरे में समेटने का कोई औचित्य नहीं है। गीता की वस्तुतः संपूर्ण विष्व समुदाय के एक श्रेश्ठ जीवनषास्त्र के रूप में पहचान बन रही है। विविध उपासना पद्धतियों पर विष्वास रखने वाले विष्व के अनेक देषों के प्रबुद्ध जन गीता को जीवन प्रबंधन के एक मार्गदर्षक ग्रंथ के रूप में मानने लगे हैं। यही कारण है कि विष्व की बीसियों भाशाओं में गीता के अनुवाद प्रकाषित हो रहे हैं। यूरोप, अमेरिका और लैटिन अमेरिकी देषोंके वैज्ञानिक तथा मनोचिकित्सक गीता के अध्ययन को अपने लिए उपयोगी पाते हैं। मनोविष्लेशण और मनोविकारों के उपचार के लिए गीता की कुछ व्याख्याओं को विज्ञान-सम्मत मानते हुए उपयोगी पाया गया है। श्रीकृश्ण ने जिस प्रकार किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये अर्जुन को गहन अवसाद की स्थिति से उबारकर संघर्शषील योद्धा में रूपांतरित किया था वह मनोवैज्ञानिकों के अनुसार उत्तम मनोपचार था।

पष्चिमी देषें में प्रकाषित हो रही जीवन-निर्माण संबंधी अनेक लोकप्रिय पुस्तकों को इन पंक्तियों के2 लेखक ने पढ़ा है। उनमें से कुछ में गीता की अनुगूंज सुनाई दी है। यह अनायास ही नहीं था कि बेहद अनिष्चिय भरी छः माह की अंतरिक्ष यात्रा पर जाते समय सुनीता विलियम्स अपने साथ गीता की एक प्रति ले गई थी।  सुप्रसिद्ध दार्षनिक बर्ट्रेंड रसल गीता को व्यावहारिक दर्षन का श्रेश्ठ ग्रंथ मानते थे। स्वामी रंगानाथानंद का मानना था कि गीता के सभी अठारह अध्यायों में ऐसा उद्धारक ज्ञान दिया गया है जिससे व्यक्ति स्वयं अपनी मुक्ति का मार्ग तलाष लेता है। गीता के दषवें अध्याय में श्रीकृश्ण ने कहा भी है, ‘‘मैं साधक के हृदय में छोटा सा ज्ञानदीप रख देता हूं जिससे वह अपना मार्ग प्राप्त कर लेता है। मेरा कार्य केवल दीप को जला देना है।‘‘

मनुश्य की भांति हमारे राश्ट्र की विशम घडि़यों में गीता सदैव सहायक होती रहती है। अठारहवीं सदी ईसवी में जब भारत के विखंडन का संकट धनीभूत हो गया था

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3तो आदिषंकराचार्य ने पहली बार विषाल ग्रंथ महाभारत से बाहर निकाल कर गीता को एक पृथक पुस्तक के रूप में प्रचारित किया। स्वामी विवेकानंद के अनुसार आदिषंकराचार्य का गौरव गीता के प्रचार से बढ़ा। गीता में निहित षक्ति को ब्रिटेन की ईस्ट इंडि़या कंपनी ने भी पहचाना था। ब्रिटिष अधिकारियों और अन्य अंग्रेजो को गीता के ज्ञान से परिचित कराने के ध्येय से अठारहवीं सदी में ईस्ट इंडि़या कंपनी ने भगवत् गीता का सर चार्ल्स विल्किन्स द्वारा किया गया अनुवाद प्रकाषित किया। जिसकी भूमिका भारत के प्रथम गवर्नर जनरल वारेन हेसिटंग्स ने लिखी थी। उस भूमिका में यह भविश्यवाणी की गई थी, ‘‘जब भारत में अंग्रेजों का प्रभुत्व समाप्त हुए बहुत समय बीत चुका होगा और (उनके राज की) षक्ति एवं संपदा मात्र स्मृति में रह जायेगी, तब भी भारतीय दर्षन के लेखक जीवित रहेंगे।‘‘

4इस तथ्य से कौन इंकार कर सकता है कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में गीता की अत्यंत प्रेरक भूमिका रही है। स्वतंत्रता संग्रामियों ने गीता से प्रेरणा लेकर भारत की आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया। महर्शि अरविंद ने अध्यात्म और स्वतंत्रता संघर्श का समन्वय गीता के दर्षन द्वारा स्थापित किया था। स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है का उद्घोश करने वाले लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने स्वातंत्रता संघर्श के लिए गीता में श्रीकृश्ण द्वारा बताए गए संघर्श पथ को अपनाया था। मांडले जेल में उन्हें समस्त यातनाओं के बीच संघर्श की षक्ति और जिजीविशा गीता से प्राप्त हुई थी। उसी कारागार में उन्होंने मराठी की अमरकृति ‘गीता रहस्य‘ की रचना की थी। यहां यह बता देना भी प्रासंगिक5 होगा कि छत्तीसगढ़ में बीसवीं षताब्दी के आरंभ में व्यापक स्वतंत्रता-चेतना तिलक के प्रभाव से जागृत हुई थी। पं. माधवराव सप्रे ने गीता रहस्य का हिंदी में अनुवाद किया था। उसके हिंदी में अब तक पचास से अधिक संस्करण प्रकाषित हो चुके हैं। पं. रविषंकर षुक्ल और वामनराव लाखे सहित उस दौर के सभी प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य तिलक के अनुयायी थे।

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1प्रसिद्ध क्रांतिकारी भाई परमानंद ने भगवत गीता को अपने चिंतन के केन्द्र में रखते हुए अंडमान निकोबार की जेल में अद्भुत पुस्तक ‘मेरा अंतिम आश्रय श्रीमद् भगवतगीता‘ लिखी थी। भाई परमानंद को लाहौर कांस्प्रेसी केस में फांसी की सजा सुनाई गई थी। फांसी की सजा सुनाये जाने के बाद उन्हें पांच वर्शो तक अंडमान जेल में रखा गया। उस दौरान न उन्हें  कोई संदर्भ पुस्तक मिलती थी और न जानकारी प्राप्त करने की अन्य कोई सुविधा। लिखने के लिए कागज का टुकड़ा तक उपलब्ध नहीं था। कल्पना की जा सकती है किस मनः स्थिति में और कितन दिक्कतों के बीच उन्होंने वह पुस्तक लिखी होगी। उन्हें फांसी की सजा सुनाई जा चुकी थी, परंतु यह पता नहीं था कि फांसी दी कब जायेगी। पुस्तक के संक्षिप्त प्राक्कथन में उन्होंने लिखा था, ‘‘अंडमान जेल में सन् 1915 से 1920 तक कुछ नोट याददाषत के तौर पर रखे गये। यह विचारक्रम बार-बार मेरे मन से गुजरता था। दो मास के अनषन के कारण मेरा ख्याल था कि कालापानी में ही मेरा षरीर त्याग होगा। इसलिए उसके बाद यदि ये नोट किसी योग्य मनुश्य के हाथ पड़ जायेंगे तो वह इन्हें छपवा कर प्रकट कर देगा। एक प्रकार से ये विचार मेरे अंत समय के हैं। तब मैं समझ बैठा था कि अब दुनिया से मेरा संबंध कभी नहीं होगा।‘‘

भाई परमानंद की पुस्तक वस्तुतः भारतीय, पाष्चात्य और अरेबिया के दर्षनषास्त्रों का सूत्र वाक्यों में व्यापक ज्ञानकोष है। उन्होंने लिखा कि इस्लामी जगत में बुखारा का राजकुमार अलगरूनी ऐसा पहला व्यक्ति था, जिसका ध्यान भगवत् गीता की तरफ गया। उसे महमूद गजनवी ने कैद कर रखा था। हिरासत में रखने के लिए वह उसे हिंन्दुस्तान पर आक्रमणों के समय में भी अपने साथ लिये रहता।
अलबरूनी ने युद्धकाल में बड़ी कठिनाइयों के बाद संस्कृत का अध्ययन किया।……उसने आध्यात्मिक 2दृश्टि से इसे अत्यंत उच्च कोटि की पवित्र पुस्तक बताया।……मुगलकाल में अकबर के आदेष से फैजी ने भगवद्गीता का अनुवाद फारसी भाशा में कराया। षहजादा दारा षिकोह ने इसका नाम ‘सरे अकबर‘ रखा। उसकी भूमिका में उसने लिखा, ‘सच्चाई का मार्ग बतलाने वाली, सत्य को पहचानने वाली, गहरे भेदों को खोलने वाली, एकता दिखाने वाली, आनंददायिनी यह कृति विलक्षण मनुश्यों में सर्वश्रेश्ठ ज्ञानी महर्शि वेदव्यास जी की है। व्यासजी का गुणानुवाद

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कर पाना वाणी और लेखनी की षक्ति से बाहर है। संसार का प्रथम प्रसिद्ध दार्षनिक अफलातून भी वेदव्यास जी द्वारा बताये मार्ग का अनुसरण करने वाले तन्मीम हिंदी के तुच्छ षिश्यों से एक था।…..भगवद् गीता और उपनिशदों के फारसी अनुवाद जब यूरोप पहंुचे, तब यूरोप के दार्षनिक इनको पढ़ कर आष्चर्यचकित रह गये। प्रसिद्ध दर्षनषास्त्री ष्लेगल भगवदगीता को पढ़ कर वज्द में आ गया। अर्थात आनंदातिरेक में झूम उठा और इसकी प्रषंसा करने लगा। षापनहावर और मेजिनी के विचारों पर गीता का गहरा असर हुआ। एमर्सन का गुरू थोरो भगवद् गीता का भक्त बन गया। उसने एक स्थान पर कहा है, ‘मैं प्रतिदिन भगवद् गीता के पवित्र जल से स्नान करता हूं। वर्तमान काल की (अन्य) कृतियों से यह कहीं श्रेयस्कर है। जिस काल में यह लिखी गई वह सचमुच ही निराला काल रहा होगा।‘ (पृश्ठ 18-19)

यह श्रीमद् भगवद्गीता के मनन या लेखन का पुण्य रहा हो अथवा अन्य कोई कारण भाई परमानंद की फांसी आजीवन कारावास में बदल गई। देष की जिस आजादी के लिए उन्होंने अपना सर्वस्व त्याग दिया उसकी प्राप्ति के बाद वे केवल चार माह ही जीवित रह पाये। अनेक क्रांतिकारी तो मातृभूमि की बलिवेदी पर हंसते-हंसते प्राणोत्सर्ग कर गये। गीता उन्हें अक्षय जिजीविशा प्रदान करती रही। ब्रिटिष जेलर और अन्य अधिकारी यह देख कर विस्मित होते थे कि गीता के ष्लोकों का जाप करते हुए वे क्रांतिवीर फांसी के फंदे की तरफ किसी धीरोद्धात नायक की भांति सीना ताने हुए सधे हुए कदमों से इस प्रकार जाते थे मानों वरमाला पहनने जा रहे हों।

महात्मा गांधी ने बड़ी स्पश्टता के साथ कहा था कि स्वतंत्रता आंदोलन सहित उनका संपूर्ण जीवन गीता के दर्षन से संचालित रहा। दिलचस्प तथ्य यह है कि गीता के प्रति गांधीजी की भक्ति अंग्रेजी कवि एडविन अर्नाल्ड की काव्यकृति ‘सेलेषियल सांग‘ पढ़ने से जागृत हुई। गांधी ने लिखा था, ‘‘सन् 1889 में गीता से मेरा प्रथम परिचय हुआ। उस समय मेरी उम्र 20 साल की थी। सर एडविन ऑर्नोल्ड का गीता का बहुत ही अच्छा काव्यानुवाद मैंने पढ़ा। उस पर मैं मुग्ध हो गया। तब से लेकर आज तक गीता के दूसरे अध्याय के अंतिम 19 ष्लोक मेरे हृदय में अंकित हैं। मेरे लिए तो सारा मानव धर्म उसी में आ गया है। उसमें संपूर्ण ज्ञान है।उसमें कहे हुए सिद्धांत अचल हैं। उसमें बुद्धि का भी संपूर्ण प्रयोग किया गया है। लेकिन यह संस्कारी बुद्धि है। उसमें अनुभवजन्य ज्ञान है। गीता का तात्पर्य कुल मिलाकर हिंसा नहीं, अहिंसा है। हिंसा से बचने का मार्ग गीता सिखाती है। लेकिन साथ-साथ वह यह भी कहती है कि कायर होकर भागने से हिंसा से नहीं बच सकोगे। जो भागने का विचार करता है वह मारेगा या मरेगा। मैं तो दुर्योधनादि को आसुरी और अर्जुनादि को दैवी वृत्ति मानता हंू। यह षरीर ही धर्म क्षेत्र है। इसमें द्वंद्व चलता ही रहता है।‘‘

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महात्मा गांधी ने गीता दर्षन के आधार पर ही भारतीयों को मृत्यु-भय से मुक्त करके निश्काम कर्मयोगी की भांति स्वतंत्रता आंदोलन में प्रवृत्त किया था। गांधी ने अहिंसा को एक षस्त्र के रूप में अपनाया था। उनकी अहिंसा में न भीरूता थी, न पलायन। वह वीर की अहिंसा थी। गांधी की इन पंक्तियों पर विचार करिए तो गीता का वीरतापूर्वक युद्ध में प्रवृत्त होने का दर्षन बड़ी प्रखरता के साथ उनसे झांकता प्रतीत होता है, ‘‘यदि कायरता और हिंसा में से किसी एक को चुनना हो तो मैं हिंसा को ही पसंद करूंगा। वीरतापूर्ण आचरण साहस है, मैं उसी की साधना करता हूं। लेकिन जिसमें ऐसा साहस नहीं है, वह भी भागते हुए लज्जाजनक मृत्यु का वरण न करे, मैं तो कहंूगा, बल्कि वह मरने के साथ मारने की भी कोषिष करे, क्योंकि जो इस तरह भागता है वह अपने मन पर अन्याय करता है। वह इसलिए भागता है कि मारते-मारते मरने का साहस उसमें नहीं है। एक समूची जाति के निस्तेज होने की अपेक्षा मैं हिंसा को हजार बार अच्छा समझंूगा।‘‘

गांधीजी को जीवन में, विषेशकर स्वाधीनता आंदोलन के दौरान अनेक प्रसंगों पर अनिर्णय की स्थिति का भी सामना करना पड़ा। अहिंसा में अटल विष्वास और मृत्यु भय से मुक्त मोहनदास करमचंद गांधी को कई बार ऐसी विकट परिस्थितियों का सामना करना पड़ा जब वे असमंजस में पड़ गये। उन्होंने दो टूक कहा जब भी ऐसी किसी विशम स्थिति ने मुझे जकड़ा मैं उससे पार पाने के लिए गीता के आश्रय में चला गया। आज भारत जब एक लम्बी छलांग लगाने का साहस जुटा रहा है तो उसके नेताओं, नीति-निर्माताओं और प्रषासकों के लिए गीता मानसिक – षारीरिक जिजीविशा के नये स्रोत खोलने में उपयोगी है। गीता को एक धर्मग्रंथ के रूप में नहीं बल्कि एक जीवन-दर्षन निर्देषिका के रूप में पढ़ा जाना चाहिए। फिर भी उसे लेकर ऐसे किसी उपक्रम से बचना चाहिए जिसके किसी समुदाय को लगे कि गीता को उसके बच्चों पर जबरिया लादा जा रहा है। भगवद् गीता का मर्म भी यही है कि इसका अध्ययन-मनन वही करें जो इसे मनोवैज्ञानिक संबल और मार्गदर्षिका के रूप में लेना चाहते हैं। गीता का मूलमंत्र ही उन्माद, मनोद्वंद्व, अनिर्णय, भ्रम और कर्मण्यता में फंसे मनुश्य और समाज को उन सबसे मुक्ति का मार्ग सिखाना है।

आज भारत जिन विशम चुनौतियों और भीतरी तथा बाहरी खतरों में फंसा हुआ है उनसे उसे उबरने के लिए गीता के कर्मयोग में तपे हुए तेजस्वी राश्ट्र नायकों की आवष्यकता है। क्षुद्र, स्वार्थी और पदलोलुप निस्तेज राजनीति वोटों का पहाड़ा पढ़ती हुई यदि गीता के महत्व को अस्वीकार करती है तो उस पर केवल दया की जा सकती है, क्योंकि गीता द्वेश और घृणा नहीं सिखाती।

-0-                          दिनांक 15.02.2015

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Poem:Ekta Geet: By Uday Pratap Singh Ex-MP of SP, Rashtriya Ekta Book

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Poem, Ekta Geet, Uday Pratap Singh, Ex-MP of SP, Rashtriya Ekta Book, Hindi Book

18

01हाईस्कूल में पढ़ते समय ही छन्द रचने लगे। किषोरवय में मार्क्सवाद की ओर रूझान। अंग्रेजी एवं हिन्दी में एम.ए.। अंग्रेजी के प्राध्यापन के रूप में लोकप्रिय और प्रतिश्टित। मदन इंटर कॉलेज, भोगांव और नारायण इंटर कॉलेज, यिकोहाबाद में 18 वर्शो तक प्राचार्य का पद संभाला। 1989 में लोकसभा के सदस्य के रूप में मैनपुरी क्षेत्र से निर्वाचित। 1997 से 2000 तक राश्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के सदस्य के रूप में कार्य। दो बार राज्य सभा के सदस्य के रूप में उत्तर प्रदेष से मनोनयन। संप्रति राज्यसभा के सदस्य के रूप में देष सेवा। 1993 में सूरीनाम में आयोजित विष्व हिन्दी सम्मेलन में भारतीय साहित्यकारों का नेतृत्व किया। अब तक 17-18 देषों की यात्रा। सांसद होते हुए भी बेहद फ़क्कड़, सहज और धरती से जुड़े व्यक्ति।

संपर्क: 19 फिरोज षाह रोड नई दिल्ली – 110001

 

एकता गीत                                                                           उदय प्रताप सिंह

(पूर्व)स.ज.पा. सांसद (षिकोहाबाद)

चाहे जो हो धर्म तुम्हारा चाहे ‘‘वादी‘‘ हो

नहीं जी रहे अगर देष के लिये तो अपराधी हो

जिसके अन्न और पानी का इस काया पर ऋण है,

जिसके समीर का अतिथि बना यह आवारा जीवन है

जिसकी मिट्टी में खेले तन दर्पण सा झलका है

उसी देष के लिये तुम्हारा रक्त नहीं छलका है,

जन गन मन के न्यायालय में तो तुम प्रतिवादी हो

नहीं जी रहे अगर देष के लिये तो अपराधी हो

जिसके पर्वत खेत, घाटियों में अक्षम क्षमता है

जिसकी नदियों की हम पर मां जैसी ममता है

जिसकी गोद भरी रहती है मिट्टी सदा सुहागिन है

उसी देष में एक कली भी भूखी या हतभागिन है,

तो चाहे तुम रेषम पहनों या धारे खादी हो

नहीं जी रहे अगर देष के लिये तो अपराधी हो

जिसके मनहर खेतों की मनहर हरियाली से

जिसके रंग बिरंगे फूल सुसज्जित डाली से

इस भौतिक दुनिया का भार हृदय से उतरा है

उसी देष को अगर किसी मनहूस नजर से खतरा है

तो चाहे दौलत ने तुमको हर सुविधा लादी हो

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नहीं जी रहे अगर देष के लिये तो अपराधी हां

अगर देष मर गया तो बोलो जीवित कौन रहेगा?

और रहे भी अगर तो उसको जीवित कौन कहेगा?

मांग रही कर्ज जवानी, सौ, सौ, सर कट जायें

पर दुष्मन के हाथ न मां के आंचल तक आ पायें

जीवन का है अर्थ तभी तक जब तक आजादी हो

चाहे जो हो धर्म तुम्हारा, चाहे जो वादी हा

नहीं जी रहे अगर देष के लिये तो अपराधी हो

चाहे हो दक्षिण के प्रहरी या हिमगिर वासी हो

चाहे राजा रंग महल का हो सन्यासी हो

चाहे षीष तुम्हारा झुकता हो मस्जिद के आगे

चाहे भक्ति तुम्हारी मन्दिर, गुरूद्वारे में जागे

भले विचारों में कितना ही अंतर बुनियादी हो

नहीं जी रहे देष के लिये तो तुम अपराधी हो

जिसके चारो ओर स्वार्थ ने खींची लक्ष्मण रेखा

जिसकी आँखों ने माता का बहता आंसू देखा

उस कायर का वीर पीढि़यां लेते नाम डरेंगी

उसकी सन्तानों पर अक्सर अंगुली उठा करेंगी

चाहे हो राजा का बेटा या फिर षहजादी हो

नहीं जी रहे अगर देष के लिये तो अपराधी हो

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गीता: विष्व समुदाय का जीवन-षास्त्र

गीता को फिर राजनीति के दलदल में घसीटने का प्रयास किया गया। पहले भी भगवत् गीता को लेकर रूस सहित कुछ अन्य समाजों के लेखकों  द्वारा अनावष्यक विवाद उछाला गया। वस्तुतः ये विवाद कुछ लेखकों और संगठनों ने खुद को चर्चा में लाने के मकसद से उछाले थे। सच तो यह है कि गीता को किसी पंथ विषेश के धर्म ग्रंथ के दायरे में समेटने का कोई औचित्य नहीं है। गीता की वस्तुतः संपूर्ण विष्व समुदाय के एक श्रेश्ठ जीवनषास्त्र के रूप में पहचान बन रही है। विविध उपासना पद्धतियों पर विष्वास रखने वाले विष्व के अनेक देषों के प्रबुद्ध जन गीता को जीवन प्रबंधन के एक मार्गदर्षक ग्रंथ के रूप में मानने लगे हैं। यही कारण है कि विष्व की बीसियों भाशाओं में गीता के अनुवाद प्रकाषित हो रहे हैं। यूरोप, अमेरिका और लैटिन अमेरिकी देषोंके वैज्ञानिक तथा मनोचिकित्सक गीता के अध्ययन को अपने लिए उपयोगी पाते हैं। मनोविष्लेशण और मनोविकारों के उपचार के लिए गीता की कुछ व्याख्याओं को विज्ञान-सम्मत मानते हुए उपयोगी पाया गया है। श्रीकृश्ण ने जिस प्रकार किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये अर्जुन को गहन अवसाद की स्थिति से उबारकर संघर्शषील योद्धा में रूपांतरित किया था वह मनोवैज्ञानिकों के अनुसार उत्तम मनोपचार था।

पष्चिमी देषें में प्रकाषित हो रही जीवन-निर्माण संबंधी अनेक लोकप्रिय पुस्तकों को इन पंक्तियों के लेखक ने पढ़ा है। उनमें से कुछ में गीता की अनुगूंज सुनाई दी है। यह अनायास ही नहीं था कि बेहद अनिष्चिय भरी छः माह की अंतरिक्ष यात्रा पर जाते समय सुनीता विलियम्स अपने साथ गीता की एक प्रति ले गई थी।  सुप्रसिद्ध दार्षनिक बर्ट्रेंड रसल गीता को व्यावहारिक दर्षन का श्रेश्ठ ग्रंथ मानते थे। स्वामी रंगानाथानंद का मानना था कि गीता के सभी अठारह अध्यायों में ऐसा उद्धारक ज्ञान दिया गया है जिससे व्यक्ति स्वयं अपनी मुक्ति का मार्ग तलाष लेता है। गीता के दषवें अध्याय में श्रीकृश्ण ने कहा भी है, ‘‘मैं साधक के हृदय में छोटा सा ज्ञानदीप रख देता हूं जिससे वह अपना मार्ग प्राप्त कर लेता है। मेरा कार्य केवल दीप को जला देना है।‘‘

मनुश्य की भांति हमारे राश्ट्र की विशम घडि़यों में गीता सदैव सहायक होती रहती है। अठारहवीं सदी ईसवी में जब भारत के विखंडन का संकट धनीभूत हो गया था

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तो आदिषंकराचार्य ने पहली बार विषाल ग्रंथ महाभारत से बाहर निकाल कर गीता को एक पृथक पुस्तक के रूप में प्रचारित किया। स्वामी विवेकानंद के अनुसार आदिषंकराचार्य का गौरव गीता के प्रचार से बढ़ा। गीता में निहित षक्ति को ब्रिटेन की ईस्ट इंडि़या कंपनी ने भी पहचाना था। ब्रिटिष अधिकारियों और अन्य अंग्रेजो को गीता के ज्ञान से परिचित कराने के ध्येय से अठारहवीं सदी में ईस्ट इंडि़या कंपनी ने भगवत् गीता का सर चार्ल्स विल्किन्स द्वारा किया गया अनुवाद प्रकाषित किया। जिसकी भूमिका भारत के प्रथम गवर्नर जनरल वारेन हेसिटंग्स ने लिखी थी। उस भूमिका में यह भविश्यवाणी की गई थी, ‘‘जब भारत में अंग्रेजों का प्रभुत्व समाप्त हुए बहुत समय बीत चुका होगा और (उनके राज की) षक्ति एवं संपदा मात्र स्मृति में रह जायेगी, तब भी भारतीय दर्षन के लेखक जीवित रहेंगे।‘‘

इस तथ्य से कौन इंकार कर सकता है कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में गीता की अत्यंत प्रेरक भूमिका रही है। स्वतंत्रता संग्रामियों ने गीता से प्रेरणा लेकर भारत की आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया। महर्शि अरविंद ने अध्यात्म और स्वतंत्रता संघर्श का समन्वय गीता के दर्षन द्वारा स्थापित किया था। स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है का उद्घोश करने वाले लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने स्वातंत्रता संघर्श के लिए गीता में श्रीकृश्ण द्वारा बताए गए संघर्श पथ को अपनाया था। मांडले जेल में उन्हें समस्त यातनाओं के बीच संघर्श की षक्ति और जिजीविशा गीता से प्राप्त हुई थी। उसी कारागार में उन्होंने मराठी की अमरकृति ‘गीता रहस्य‘ की रचना की थी। यहां यह बता देना भी प्रासंगिक होगा कि छत्तीसगढ़ में बीसवीं षताब्दी के आरंभ में व्यापक स्वतंत्रता-चेतना तिलक के प्रभाव से जागृत हुई थी। पं. माधवराव सप्रे ने गीता रहस्य का हिंदी में अनुवाद किया था। उसके हिंदी में अब तक पचास से अधिक संस्करण प्रकाषित हो चुके हैं। पं. रविषंकर षुक्ल और वामनराव लाखे सहित उस दौर के सभी प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य तिलक के अनुयायी थे।

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प्रसिद्ध क्रांतिकारी भाई परमानंद ने भगवत गीता को अपने चिंतन के केन्द्र में रखते हुए अंडमान निकोबार की जेल में अद्भुत पुस्तक ‘मेरा अंतिम आश्रय श्रीमद् भगवतगीता‘ लिखी थी। भाई परमानंद को लाहौर कांस्प्रेसी केस में फांसी की सजा सुनाई गई थी। फांसी की सजा सुनाये जाने के बाद उन्हें पांच वर्शो तक अंडमान जेल में रखा गया। उस दौरान न उन्हें  कोई संदर्भ पुस्तक मिलती थी और न जानकारी प्राप्त करने की अन्य कोई सुविधा। लिखने के लिए कागज का टुकड़ा तक उपलब्ध नहीं था। कल्पना की जा सकती है किस मनः स्थिति में और कितनी दिक्कतों के बीच उन्होंने वह पुस्तक लिखी होगी। उन्हें फांसी की सजा सुनाई जा चुकी थी, परंतु यह पता नहीं था कि फांसी दी कब जायेगी। पुस्तक के संक्षिप्त प्राक्कथन में उन्होंने लिखा था, ‘‘अंडमान जेल में सन् 1915 से 1920 तक कुछ नोट याददाषत के तौर पर रखे गये। यह विचारक्रम बार-बार मेरे मन से गुजरता था। दो मास के अनषन के कारण मेरा ख्याल था कि कालापानी में ही मेरा षरीर त्याग होगा। इसलिए उसके बाद यदि ये नोट किसी योग्य मनुश्य के हाथ पड़ जायेंगे तो वह इन्हें छपवा कर प्रकट कर देगा। एक प्रकार से ये विचार मेरे अंत समय के हैं। तब मैं समझ बैठा था कि अब दुनिया से मेरा संबंध कभी नहीं होगा।‘‘

भाई परमानंद की पुस्तक वस्तुतः भारतीय, पाष्चात्य और अरेबिया के दर्षनषास्त्रों का सूत्र वाक्यों में व्यापक ज्ञानकोष है। उन्होंने लिखा कि इस्लामी जगत में बुखारा का राजकुमार अलगरूनी ऐसा पहला व्यक्ति था, जिसका ध्यान भगवत् गीता की तरफ गया। उसे महमूद गजनवी ने कैद कर रखा था। हिरासत में रखने के लिए वह उसे हिंन्दुस्तान पर आक्रमणों के समय में भी अपने साथ लिये रहता। अलबरूनी ने युद्धकाल में बड़ी कठिनाइयों के बाद संस्कृत का अध्ययन किया।……उसने आध्यात्मिक दृश्टि से इसे अत्यंत उच्च कोटि की पवित्र पुस्तक बताया।……मुगलकाल में अकबर के आदेष से फैजी ने भगवद्गीता का अनुवाद फारसी भाशा में कराया। षहजादा दारा षिकोह ने इसका नाम ‘सरे अकबर‘ रखा। उसकी भूमिका में उसने लिखा, ‘सच्चाई का मार्ग बतलाने वाली, सत्य को पहचानने वाली, गहरे भेदों को खोलने वाली, एकता दिखाने वाली, आनंददायिनी यह कृति विलक्षण मनुश्यों में सर्वश्रेश्ठ ज्ञानी महर्शि वेदव्यास जी की है। व्यासजी का गुणानुवाद

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कर पाना वाणी और लेखनी की षक्ति से बाहर है। संसार का प्रथम प्रसिद्ध दार्षनिक अफलातून भी वेदव्यास जी द्वारा बताये मार्ग का अनुसरण करने वाले तन्मीम हिंदी के तुच्छ षिश्यों से एक था।…..भगवद् गीता और उपनिशदों के फारसी अनुवाद जब यूरोप पहंुचे, तब यूरोप के दार्षनिक इनको पढ़ कर आष्चर्यचकित रह गये। प्रसिद्ध दर्षनषास्त्री ष्लेगल भगवदगीता को पढ़ कर वज्द में आ गया। अर्थात आनंदातिरेक में झूम उठा और इसकी प्रषंसा करने लगा। षापनहावर और मेजिनी के विचारों पर गीता का गहरा असर हुआ। एमर्सन का गुरू थोरो भगवद् गीता का भक्त बन गया। उसने एक स्थान पर कहा है, ‘मैं प्रतिदिन भगवद् गीता के पवित्र जल से स्नान करता हूं। वर्तमान काल की (अन्य) कृतियों से यह कहीं श्रेयस्कर है। जिस काल में यह लिखी गई वह सचमुच ही निराला काल रहा होगा।‘ (पृश्ठ 18-19)

यह श्रीमद् भगवद्गीता के मनन या लेखन का पुण्य रहा हो अथवा अन्य कोई कारण भाई परमानंद की फांसी आजीवन कारावास में बदल गई। देष की जिस आजादी के लिए उन्होंने अपना सर्वस्व त्याग दिया उसकी प्राप्ति के बाद वे केवल चार माह ही जीवित रह पाये। अनेक क्रांतिकारी तो मातृभूमि की बलिवेदी पर हंसते-हंसते प्राणोत्सर्ग कर गये। गीता उन्हें अक्षय जिजीविशा प्रदान करती रही। ब्रिटिष जेलर और अन्य अधिकारी यह देख कर विस्मित होते थे कि गीता के ष्लोकों का जाप करते हुए वे क्रांतिवीर फांसी के फंदे की तरफ किसी धीरोद्धात नायक की भांति सीना ताने हुए सधे हुए कदमों से इस प्रकार जाते थे मानों वरमाला पहनने जा रहे हों।

महात्मा गांधी ने बड़ी स्पश्टता के साथ कहा था कि स्वतंत्रता आंदोलन सहित उनका संपूर्ण जीवन गीता के दर्षन से संचालित रहा। दिलचस्प तथ्य यह है कि गीता के प्रति गांधीजी की भक्ति अंग्रेजी कवि एडविन अर्नाल्ड की काव्यकृति ‘सेलेषियल सांग‘ पढ़ने से जागृत हुई। गांधी ने लिखा था, ‘‘सन् 1889 में गीता से मेरा प्रथम परिचय हुआ। उस समय मेरी उम्र 20 साल की थी। सर एडविन ऑर्नोल्ड का गीता का बहुत ही अच्छा काव्यानुवाद मैंने पढ़ा। उस पर मैं मुग्ध हो गया। तब से लेकर आज तक गीता के दूसरे अध्याय के अंतिम 19 ष्लोक मेरे हृदय में अंकित हैं। मेरे लिए तो सारा मानव धर्म उसी में आ गया है। उसमें संपूर्ण ज्ञान है।उसमें कहे हुए सिद्धांत अचल हैं। उसमें बुद्धि का भी संपूर्ण प्रयोग किया गया है। लेकिन यह संस्कारी बुद्धि है। उसमें अनुभवजन्य ज्ञान है। गीता का तात्पर्य कुल मिलाकर हिंसा नहीं, अहिंसा है। हिंसा से बचने का मार्ग गीता सिखाती है। लेकिन साथ-साथ वह यह भी कहती है कि कायर होकर भागने से हिंसा से नहीं बच सकोगे। जो भागने का विचार करता है वह मारेगा या मरेगा। मैं तो दुर्योधनादि को आसुरी और अर्जुनादि को दैवी वृत्ति मानता हंू। यह षरीर ही धर्म क्षेत्र है। इसमें द्वंद्व चलता ही रहता है।‘‘

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महात्मा गांधी ने गीता दर्षन के आधार पर ही भारतीयों को मृत्यु-भय से मुक्त करके निश्काम कर्मयोगी की भांति स्वतंत्रता आंदोलन में प्रवृत्त किया था। गांधी ने अहिंसा को एक षस्त्र के रूप में अपनाया था। उनकी अहिंसा में न भीरूता थी, न पलायन। वह वीर की अहिंसा थी। गांधी की इन पंक्तियों पर विचार करिए तो गीता का वीरतापूर्वक युद्ध में प्रवृत्त होने का दर्षन बड़ी प्रखरता के साथ उनसे झांकता प्रतीत होता है, ‘‘यदि कायरता और हिंसा में से किसी एक को चुनना हो तो मैं हिंसा को ही पसंद करूंगा। वीरतापूर्ण आचरण साहस है, मैं उसी की साधना करता हूं। लेकिन जिसमें ऐसा साहस नहीं है, वह भी भागते हुए लज्जाजनक मृत्यु का वरण न करे, मैं तो कहंूगा, बल्कि वह मरने के साथ मारने की भी कोषिष करे, क्योंकि जो इस तरह भागता है वह अपने मन पर अन्याय करता है। वह इसलिए भागता है कि मारते-मारते मरने का साहस उसमें नहीं है। एक समूची जाति के निस्तेज होने की अपेक्षा मैं हिंसा को हजार बार अच्छा समझंूगा।‘‘

गांधीजी को जीवन में, विषेशकर स्वाधीनता आंदोलन के दौरान अनेक प्रसंगों पर अनिर्णय की स्थिति का भी सामना करना पड़ा। अहिंसा में अटल विष्वास और मृत्यु भय से मुक्त मोहनदास करमचंद गांधी को कई बार ऐसी विकट परिस्थितियों का सामना करना पड़ा जब वे असमंजस में पड़ गये। उन्होंने दो टूक कहा जब भी ऐसी किसी विशम स्थिति ने मुझे जकड़ा मैं उससे पार पाने के लिए गीता के आश्रय में चला गया। आज भारत जब एक लम्बी छलांग लगाने का साहस जुटा रहा है तो उसके नेताओं, नीति-निर्माताओं और प्रषासकों के लिए गीता मानसिक – षारीरिक जिजीविशा के नये स्रोत खोलने में उपयोगी है। गीता को एक धर्मग्रंथ के रूप में नहीं बल्कि एक जीवन-दर्षन निर्देषिका के रूप में पढ़ा जाना चाहिए। फिर भी उसे लेकर ऐसे किसी उपक्रम से बचना चाहिए जिसके किसी समुदाय को लगे कि गीता को उसके बच्चों पर जबरिया लादा जा रहा है। भगवद् गीता का मर्म भी यही है कि इसका अध्ययन-मनन वही करें जो इसे मनोवैज्ञानिक संबल और मार्गदर्षिका के रूप में लेना चाहते हैं। गीता का मूलमंत्र ही उन्माद, मनोद्वंद्व, अनिर्णय, भ्रम और कर्मण्यता में फंसे मनुश्य और समाज को उन सबसे मुक्ति का मार्ग सिखाना है।

आज भारत जिन विशम चुनौतियों और भीतरी तथा बाहरी खतरों में फंसा हुआ है उनसे उसे उबरने के लिए गीता के कर्मयोग में तपे हुए तेजस्वी राश्ट्र नायकों की आवष्यकता है। क्षुद्र, स्वार्थी और पदलोलुप निस्तेज राजनीति वोटों का पहाड़ा पढ़ती हुई यदि गीता के महत्व को अस्वीकार करती है तो उस पर केवल दया की जा सकती है, क्योंकि गीता द्वेश और घृणा नहीं सिखाती।

-0-                          दिनांक 15.02.2015

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Bhart Ki Ekta Aur Sanvidhan Ki Dhara 370: Rashtriya Ekta

Rashtriya Ekta : Cover Pages

Anukram : Contents

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Bhart Ki Ekta , Sanvidhan, Dhara 370, Rashtriya  Ekta Book , HIndi Book

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भारत की एकता और संविधान की धारा 370

1हिन्दुस्तान का यह दुर्भाग्य है कि इसके राजनैतिक नेता और बुद्धिजीवी यथार्थ की अपेक्षा कल्पना की दुनिया में विचरना पसन्द करते हैं। इसलिए वे तथ्यों को जो इतिहास का वास्तविक आधार होते हैं, जानने का प्रयत्न ही नहीं करते क्योंकि उन्हें डर रहता है कि तथ्य उनकी  कल्पना का महत्व ध्वस्त कर देंगे। यह बात कष्मीर के साथ संबंधित घटनाचक्र

और विषेश रूप में संविधान में 1949 में डाले गए अस्थायी अनुच्छेद अथवा धारा 370 पर खास तौर पर2 लागू होती है। इसे कष्मीर को षेश भारत के साथ जोड़ने वाला पुल कहना इसी का परिणाम है। वास्तव में यह पुल नहीं बल्कि खाई है जो कष्मीर और विषेश रूप में इसकी मुस्लिम जनता को भारत से दूर रखने में सहायक हो रही है। इस धारा के इतिहास को तथ्यों के आधार पर समझने से यह बात स्पश्ट हो जाती है।

इस अनुच्छेद के संबंध में पहला अकाट्य तथ्य यह है कि इसका जम्मू-कष्मीर रियासत के भारत में विलय के साथ कोई संबंध नहीं हैं। विलयपत्र पर महाराज हरिसिंह ने 26 अक्टू.1947 को हस्ताक्षर किया था जबकि धारा 370 भारत के संविधान में सित. 1949 में डाली गई थी। यह कहना कि कष्मीर का भारत में विलय इस धारा के साथ जुड़ा हुआ है, बुनियादी तथ्यों से अपनी अनभिज्ञता जताना मात्र है।

3महाराजा हरिसिंह ने उसी विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए थे जिस पर पटियाला और भोपाल आदि अन्य रियासतों के षासको ने किए थे। उसके अनुसार इन रियासतों ने केवल सुरक्षा, विदेष नीति और संचार विभाग केन्द्र  को सौपे थे, परन्तु संविधान सभा में उनके प्रतिनिधियों ने देषी राज्यों को ब्रिटिष भारत के प्रदेषों के स्तर पर लाने का फैसला किया यह जम्मू कष्मीर पर भी लागू होता था। महाराजा हरिसिंह को 1947 में ही पंगु बना दिया गया था उनके मानने या न मानने का प्रष्न नहीं था। चली षेख ब्दुल्ला की थी।

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4कष्मीर के संबंध में जनमत की बात उठाने और संयुक्त राश्ट्र संघ द्वारा 1948 में जनमत संबंधी प्रस्ताव पास करने से एक नई स्थिति पैदा हो गई थी। डिक्सन रिपोर्ट के अनुसार जनमत कष्मीर घाटी तक सीमिमत कर दिया गया था। इस स्थिति का षेख अब्दुल्ला ने लाभ उठाना चाहा। उसने पं. नेहरू पर दबाव डाला कि कष्मीर मुसलमानों के भारत के पक्ष में मत प्राप्त करने के लिए आवष्यक है कि इसकी मुस्लिम बाहुल पहिचान स्थायी रूप से कायम रखा और इसे लग संविधान के साथ विषेश दर्जा दिया जाय।  अब्दुल्ला चाहता था कि कष्मीर पर केन्द्र का कोई अधिकार सुरक्षा, विदेष नीति और संचार तक सीमित हो, इसका अलग नागरिकता कानून हो और भारत के लोगों को कष्मीर में किसी प्रकार का कोई अधिकार न हो।

5पं. नेहरू ने षेख अब्दुल्ला को विधि मंत्री डा. भीमराव अम्बेडकर के पास भेजा। अब्दुल्ला की बात सुनकर ड़ा. अम्बेड़कर ने जो कुछ कहा वह उन्होंने स्वयं मुझे बताया था। उन्होने अब्दुल्ला से कहा कि तुम चाहते हो कि भारत तुम्हारी रक्षा करे, सड़क बनाए, अनाज दे, कष्मीर को सारे भारत के बराबर के अधिकार प्राप्त हो परन्तु भारत सरकार के कष्मीर में अधिकार अति सीमित हों और भारत के लोगों का कष्मीर में कोई अधिकार न हो। मैं भारत का विधि मंत्री हंू, तुम्हारी बात मानना भारत के हितों से द्रोह करना होगा मैं यह नही करूंगा।

ड़. अंबेड़कर से टका सा जवाब मिलने के बाद अब्दुल्ला फिर पं. नेहरू के पास गया। पंडि़त जी 6ने तब गोपाल स्वामी आयंगर को कहा कि किसी प्रकार अब्दुल्ला को सन्तुश्ट किया जाय। परन्तु संविधान सभा इस प्रकार का कोई सुझाव मानने को तैयार नहीं थी। तब श्री आयंगर सरदार पटेल के पास गए और उन्हें कहा कि पं. नेहरू, अब्दुल्ला को वचन दे बैठे हैं उनकी इज्जत का सवाल है, इसलिए वे कुछ करें। पं. नेहरू उस समय विदेष में थे। सरदार पटेल ने स्थिति की नजाकत को समझते हुए इस धारा को पास तो करवा दिया परन्तु संविधान सभा में सरकार की ओर से स्पश्ट आष्वासन दिया गया कि जनमत संबंधी प्रस्ताव के दबाव के कारण जो विषेश स्थिति पैदा हुई है

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उसके कारण इसे संविधान में डाला गया है और आषा व्यक्त की कि इसे षीघ्र निरस्त कर दिया जायेगा। इसलिए इस धारा  को संविधान के उस अध्याय में रखा जिसका षीर्शक है:-

अस्थायी और बदली जाने वाले धाराएं

इन तथ्यों के प्रकाष में इस धारा को स्थायी बनाने की बात करना न केवल गलत है बल्कि देष के साथ धोखा भी है।

जहां तक कष्मीर के लोंगो की भारत के सेक्यूलरिज़म की रक्षा करने और पाकिस्तानियों से लड़ने की बात है, यह सरासर कपोलकल्पित और सारहीन है। पाकिस्तान के आक्रमण के समय मैं श्रीनगर में था। मैं वहां के डी.स.वी. कालेज में  इतिहास विभाग का अध्यक्ष और उसका उप प्रधानाचार्य था। मेरा संघ के साथ भी संबंध था और रियासत के भारत में विलय के लिए प्रयत्नषील था। इसलिए मुझे वहां की स्थिति की प्रत्यक्ष और परोक्ष जानकारी है। जब 21 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान का आक्रमण षुरू हुआ कष्मीर घाटी में इसके विरोध में एक आवाज नहीं उठी। षेख अब्दुल्ला अपने परिवार समेत इन्दौर चला गया उसके साथी किंकर्तव्यविमूढ़ होकर घरों में बैठ गए। जहां कहीं पाकिस्तानी आक्रान्ता पहंुच जाते, मुसलमान पाकिस्तानी झंड़े लहरा कर उनके साथ हो जाते। बारामूला का मकबूल षेरवानी एकमात्र अपवाद सिद्ध हुआ। यह स्थिति 26 अक्टूबर तक बनी रही। उस दिन दोपहर तक कुछ पाकिस्तानी आक्रान्ता छत्ताबल और षाहिन टांग जो श्रीनगर के बारामूला तीन वाली सड़क पर स्थित उपनगर है, तक पहंुच गए और वहां छुट-पुट लुटपाट भी षुरू हो गई। 26 अक्टूबर को दोपकर तीन बजे सूचना मिली कि विलय हो गया है, और भारत की सेना श्रीनगर पहुंच रही है। उसी समय मेरे कहने पर पुलिस डी.आई.जी. श्री ज्ञानवन्द्र बाली वर्दी पहन कर जीप पर श्रीनगर में घूम गए और लोंगो को बताया कि भारतीय सेना आ रही है और चेतावनी दी कि गड़बड़ करने वालों को कड़ा दंड़ दिया जाएगा। इसकी अपेक्षित प्रभाव पड़ा।

सांयकाल तक नेषनल कांन्फेस के झंुड सड़कों पर निकल पड़े। वे नारे लगा रहे थे-

‘‘यह मुल्क हमारा है इसकी

हिफाजत हम करेंगे इसकी

हकूमत हम करेंगे।‘‘

यदि 27 अक्टूबर को भारत की सेना श्रीनगर न पहुंचती तब पता चलता कि कष्मीरी पहचा मुसलमान कितने सेक्युलर हैं। मेरे मन मे यह सन्देह नहीं कि न मैं और न कोई अन्य कष्मीरी हिन्दू कष्मीरी मुसलमानों के सक्यूलरिज्म के तथ्यों को जाने और आत्मवंचना बंन्द करें।

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जहां तक कष्मीरी पहचान बनाए रखने का प्रष्न है, उस पर सबसे कड़ा कुठाराघात स्वयं षेख अब्दुल्ला ने किया। जम्मू कष्मीर राज्य के छः भौगोलिक और भाशाई क्षेत्र हैं, उनमें से पहला तो जम्मू है जो रावी नदी से पंचाल पर्वत तक फैला हुआ है। यहां के लोग डोंगरी, भद्रवाही, किष्तवाडी और पहाड़ी बोलियां बोले है जो संस्कृत के अति निकट हैं और जिनकी लिपि देवनागरी है।

दूसरा क्षेत्र लद्दाख है जो जम्मू क्षेत्र से जुड़ा है और उसके लोग तिब्बती में लिखी बोधी भाशा बोलते 7हैं।

तीसरा क्षेत्र बाल्टिस्तान है जिसी राजधानी अस्कर्दू मेरी जन्मभूमि है। यहां के लोग बाल्टी भाशा बोलते हैं।

चौथा क्षेत्र बल्टिस्तान के पष्चिम में स्थिति गिलगित क्षेत्र है जहां के लोग दर्द या दार्दक भाशा बोलते हैं। लद्दाख बाल्टिस्तान और गिलगित हिमालय के उत्तर में स्थित है तथा तिब्बत और चीन के साथ जुड़े हुए हैं।

पांचवा क्षेत्र मीरपुर, मुजफ्फराबाद है जो तथाकथित ‘‘आजाद कष्मीर‘‘

कहलाता है। यह जेहलम नदी के सटा हुआ मुस्लिम बाहुल क्षेत्र है। यहां के लोगों की भाशा पोठाहारी पंजाबी है।

छठवां क्षेत्र कष्मीर घाटी है यहां के लोग कष्मीरी भाशा बोलते हैं।कष्मीरी वैदिक संस्कृत से निकली एक विकसित भाशा है और भारत के संविधान के अनुच्छेद 8 में उसे षामिल किया गया है।       इस क्षेत्र में से तीन मुस्लिम बाहुल क्षेत्र- बाल्टिस्तान, गिलगित, मुज्फ्फराबाद अब पाकिस्तान के अधिकार में है। भारत के पास केवल जम्मू, लद्दाख और कष्मीर घाटी है। केवल कष्मीर घाटी मुस्लिम बाहुल है।

यदि षेख अब्दुल्ला को कष्मीर की विषेश पहचान बनाये रखने की चिंता होती तो वह कष्मीर, जम्मू, और लद्दाख को स्वायत्ता देने में पहल करता

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और कष्मीर घाटी के लिए कष्मीर को षिक्षा और प्रषासन की भाशा बनाता। इस एक पत्र से वह न केवल कष्मीर में कष्मीरीयत की रक्षा कर पाता अपितु कष्मीर को षेश भारत के निकट भी ले आता। परन्तु इसनें किया उसके उल्टा।

यह एक कटु सत्य है कि षेख अब्दुल्ला पहले मुसलमान था फिर कष्मीरी था और भारतीय तभी बनता था जब सुविधा उसे बाध्य करती थी। उसने कष्मीर पर कष्मीरी की बजाय फारसी लिपि में उर्दू को इसलिये लाया कि उसका रिष्ता पाकिस्तान के साथ मजबूत हो और भारत के साथ कमजोर। वह न राश्ट्रवादी था और न भारत भक्त। उसका एकमात्र लक्ष्य अपने लिये कष्मीर में स्वतंत्र सत्ता प्राप्त करना था। जब वह भारत की सेना पर रथ पर सवार होकर 27 अक्टूबर 1947 को सांयकाल श्रीनगर लौटा तो आते ही प्रताप चौक मे एक सार्वजनिक भाशण दिया। मैंने उसका वह एक घंटे का भाशण बड़े ध्यान से सुना। इसमें उसने अपने मुस्लिम श्रोताओं से अनेक बार कलमा पढ़वाया और कहा कि, ‘‘हमने कष्मीर का ताज खाक से उठाया है हम हिन्दुस्तान में जाऐं या पाकिस्तान में, यह बाद का सवाल है, पहले हमें अपनी आजादी मुकम्मल करनी है।‘‘ परन्तु, भारत, भारतीय सेना, और रियासत के भारत में विलय का एक बार भी उल्लेख नहीं किया। उस एक भाशण से ही उसके ईरादे स्पश्ट हो गए। आज कष्मीर घाटी में जो कुछ हो रहा है उसके बीज षेख अब्दुल्ला ने इस भाशण के द्वारा 27 अक्टूबर को ही डाल दिए थे।

धारा 370 और उसके अन्तर्गत के अलग संविधान और अलग नागरिकता कानून के कारण कष्मीर की स्थिति में अनेक विसंगतियां और खराबियां पैदा हो चुकी हैं। जम्मू क्षेत्र में पष्चिम पंजाब से एक लाख के लगभग आए विस्थापियों को आज भी विधानसभा के लिए मत देने का अधिकार नहीं। मेरे जैसे व्यक्ति जो वहीं पैदा हुआ, वहीं बड़ा हुआ और आज भी कष्मीर के साथ जुड़ा हुआ है वहां न नौकरी कर सकता है और न मकान के लिए जमीन का  टुकड़ा खरीद सकता है।

दूसरी ओर इस धारा के कारण कष्मीरियों में यह धारणा पैदा हो चुकी है कि कष्मीर भारत नही और कि इसके भविश्य फैसला अभी होना है इससे उनके अलगाववाद को आधार भी मिलता है और बल भी।यदि यह धारा निरस्त कर दी जाय और भारत का संविधान कष्मीर पर लागू कर दिया जाय तो कष्मीर के लोगों को वास्तविकता को समझने और उसके साथ समझौता करने की सहायता मिलेगी।                व्यवहार में धारा 370 का लाभ केवल कष्मीरियों के षासक वर्ग को मिलता रहा है। इसके कारण उनकी अपनी निरंकुष सत्ता बनाए रखने में  भी सहायता मिलती रही है और आर्थिक षोशण में भी। जगमोहन ने अपनी पुस्तक में इस धारा के व्यवहारिक पहलू पर जो प्रकाष डाला है उसे नकारा नहीं जा सकता।

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आवष्यकता है कि भारत का बुद्धिजीवि और षासक वर्ग कष्मीर के संबंध में खराब, राश्ट्रवादी और यथार्थवादी दृश्टिकोण अपनाएं। उन्हें सबसे पहले अपने दिलों से पूछना चाहिए कि क्या वे वास्तव में कष्मीर को भारत का अंग मानते हैं या नहीं मानते। यदि यह अंग है, जो एक वास्तविकता है, तो भारत का संविधान जो सारे देष के लगभग 10 करोड़ मुसलमानों के भारत सभी लोगों के लिए उपयुक्त है, कष्मीर घाटी के 30 लाख मुसलमानों के लिए क्यों उपयुक्त नहीं। यह अनुच्छेद कष्मीरी मुसलमानों को भारत के संविधान से काटता है और उनमें यह अहसास पैदा करता है कि कष्मीर का भारत में विलय अस्थायी है और इसका अन्तिम फैसला अभी होना है। इस प्रकार यह धारा उनके और षेश देष के बीच एक मनोवैज्ञानिक खाई का काम करती है। इसे पाटने का एक ही इलाज है और वह है कष्मीर का अलग संविधान खत्म करके उस पर भारत का संविधान पूर्ण रूपेण लागू करना। संविधान के अन्तर्गत कष्मीर की विषेश स्थिति को ध्यान में रखते हुए कुछ अन्य विषेश पग उठाये जा सकते हैं।  इस धारा को निरस्त करने में कोई संवैधानिक अड़चन नही है।

भारत की संसद सर्वसत्ता सम्पन्न है। यह उस अस्थायी धारा को निरस्त कर सकती है।

जहां तक रियासत के लोगों का संबंध है स्थिति स्पश्ट है। जम्मू और लद्दाख का बहुमत इस धारा को नहीं चाहता। कष्मीर घाटी के हिन्दुओं ने भी अपने प्रतिनिधि सम्मेलन मे स्पश्ट कर दिया है कि कष्मीर घाटी पर उनका भी बराबरी का अधिकार है। वे घाटी के दक्षिण भाग में अपना एैसा अलग क्षेत्र चाहता है जिसे भारत सरकार केन्द्र षासित प्रदेष का दर्जा दे।

स्पश्ट है कि वे धारा 370 और अलग संविधान नही चाहते फिर यह धारा 370 है किसके लिए? जो इसे निरस्त करने का विरोध कर रहे हैं वे तो भारत से कट कर पाकिस्तान में मिलना चाहते हैं, उन्हे धारा 370 से कुछ लेना देना नहीं। इसलिये उन्हें संतुश्ट करने के लिए उस धारा की वकालत करना निरर्थक ही नही राश्ट्रविरोधी कार्य भी है।8

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Editorial : Rashriya Ekta Book

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Editorial, Rashriya Ekta, Rashriya Ekta Book, Book Hindi

“राष्ट्रीय एकता’’

 

                                                                                                   सम्पादकीय

 

 

राश्ट्रीय एकता

 

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प्रेमेन्द्र अग्रवाल

हम कौन हैं, हमारा भारत क्या है, हमारे पूर्वज हमारे राश्ट्रपुरूश कौन थे, हमारी संस्कृति और सभ्यता क्या है, इन सब प्रष्नों के सही उत्तर प्राप्त किये बिना राश्ट्रीय एकता को समझना और इसके लिए कुछ करना मृगमरीचिका के समान ही निरर्थक प्रयास होगा। हमारी राश्ट्रीय एकता में सबसे बड़ी बाधा हमारी अभारतीय षिक्षा व कृत्रम विकृत इतिहास है जिसे अ्रग्रेजी षासन काल में बड़े योजनाबद्ध रूप से गढ़ा गया और आज स्वतंत्र भारत में भी उसी का अनुसरण हम कर रहे हैं।

 

हिन्दू बाहर से नहीं आये

हमें इस ऐतिहासिक सत्य को स्वीकार करना चाहिए कि ‘आर्य‘ षब्द

सर्वप्रथम विष्व के प्राचीनतम ग्रन्थ वेदो में श्रेश्ठ विषेशण के रूप में प्रयुक्त हुआ।

 

प्राचीन काल से सिन्धु घाटी के इस पार रहने वालों को हिन्दू कहा जाता रहा है। हिन्दू में आर्य और द्रविण अर्थात ऊत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय दोनो सम्मिलित हैं। आर्य और द्रविण एक दूसरे के अभिन्न अंग रहे हैं, बन्धु रहे हैं,दुष्मन नहीं। हमारे ईष्वर के प्रमुख मनुश्य अवतारों राम, कृश्णा, बुद्ध, आदि का रंग सांवला (द्रविणों जैसा) ही है।

 

हिन्दू का वह सहज धर्म जिससे हिन्दू हिन्दू कहलाता है। हिन्दूधर्म नहीं हिन्दुत्व हैं। किसी समुदाय के धर्म का भ्रम उससे नही होना चाहिए। इस

तथ्य की पुश्टि हमारे प्रायः सभी महापुरूशों ने की है।

 

महात्मा गांधी ने कहा – ‘‘ हिन्दुत्व सत्य के अनवरत षोध का ही दूसरा नाम है।‘‘

 

2भू.पू. राश्ट्रपति महान दार्षनिक डा. राधाकृश्णन की मान्यता रही है कि ‘‘ हिन्दू तो एक जीवन पद्धति (ॅंल व िस्पमि) है। यह हमारे जीवन का अंग है, हमारे धर्म का नहीं।

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‘महाभारत‘ दूरदर्षन धारावाहिक के संवाद लेखक डा. राही मासूम रज़ा

जिनका स्वर्गवास हो चुका है ने एक लेख में कहा था-

‘‘ हिन्दू षब्द किसी धर्म से ताल्लुक नहीं रखता। ईरान और अरब के लोग हिन्दुस्तानी मुसलमान को भी हिन्दू कहते हैं। यानी हिन्दू नाम है हिन्दुस्तानी

कौम का, मैंने अपनी थीसिस में यही बात लिखी थी तो उर्दू के मषहूर विद्वानने यही बात काट दी थी‘‘ अतएव हम सभी भारतीयों को चाहे किसी भी धर्म के अनुयायी हों हिन्दू षब्द को वास्तविक अर्थ में अपनाना चाहिए।

भारत नया निर्माणाधीन राश्ट्र नहीं

भारत का निर्माण एक दिन में …..हुआ है। हां भारत का विभाजन जरूर रातों रात एक दिन में अंग्रेजों के क्रुचक्र में फंस कर हुआ है। हमारे भारत का इतिहास विष्व का प्राचीनतम इतिहास है। आज हम जिस भारत भूमि के वासी हैं उसी भारत भूमि के वासी सहस्त्रों वर्शों से हमारे पूर्वज रहें हैं, हमारे राश्ट्रपुरूश एक हैं, संस्कृति एक है, सभ्यता एक है। विश्णु पुराण में एक ष्लोक है जिसका भावार्थ है कि जिसके उत्तर में हिमालय, दक्षिण में समुद्र है उसी का नाम भारत है उसी की संतान हम भारतीय हैं। अतएव भारत कोई नया निर्माणाधीन राश्ट्र नहीं है, अति पुरातन सनातन राश्ट्र है।

कृत्रिम या निर्माणाधीन राश्ट्र के समक्ष किस प्रकार की अजीबो गरीब स्थिति पैदा हो जाती है इसे समझने के लिये हम पाकिस्तान का ही उदाहरण लें। सन् 1947 के पहले पाकिस्तान भारत का ही एक अंग था। 1947 के पहले का उसका अलग से कोई इतिहास या संस्कृति नहीं है। इसलिए पाकिस्तान को इस सत्य को झुठलाने में बड़ी कसरत करनी पड़ रहीं है।

पाकिस्तान के दिल्ली स्थित राजदूत अफजल इकबाल ने एक अवसर पर कहा था कि इकबाल की नज्म ‘सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा‘ से यह नहीं समझना चाहिए कि उन्होने हिन्दुस्तान की षान में यह लिखा नहीं, उन्होंने यह समूचे विष्व के लिए लिखा है। इस प्रकार के कुतर्क क्यों करने पड़ रहे हैं?

इसी प्रकार का दूसरा उदाहरण बसन्त पंचमी का है। सैकड़ों वर्शो से

इसे हिन्दू और मुस्लिम दोनों मनाते हैं। आज भी भारत के समान ही पाकिस्तान

के सूबा पंजाब में भी बसंत पंचमी धूमधाम से मनाई जाती है। परन्तु अब वहां के

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कट्टर पंथी जनता से इसे न मनाने का फतवा जारी किये हैं उन्हें इसमें भारतीय संस्कृति की सुगंध मिल रही हैं।

हमारे राश्ट्रपुरूश कौन हैं?

न गोरी रहा है न बाबर रहा है

मगर राम युग युग उजागर रहा है

अधिकांष मुस्लिम बंधुओं को उनके कट्टरपन और हमारी सरकार की तुश्टीकरण की नीति ने यह सोचने ही नहीं दिया कि मुगलकाल से पहले भीभारत था। वे भी मुगलकालीन भारत के ही नहीं विष्व के सर्वाधिक प्राचीन

गौरवषाली जगत गुरू, भारत के वंषज हैं। यही बात ईसाइयों पर भी लागू होती है। भय और लोभ के कारण अनेक लोगों ने धर्म परिवर्तित किया और

कुछ लोगों ने जीवन पद्धति भी बदल डाली। अंग्रेजों ने भी अपनेषासनकाल

में अनेकों को इसाई बनाया और जो इसाई नहीं बने उन्हे लार्ड मेकाले की षिक्षा नीति ने अंग्रेजी सभ्यता का गुलाम बना दिया इन सब बातों का प्रभाव हम आज भी भारत में देख रहे हैं और ये ही बातें राश्ट्रीय एकता में बाधक है।

डा. हेडगेवार ओर वीर सावरकर ही नहीं डा. राधाकृश्णन जैसे महान व्यक्तियों के विचार रहे हैं कि धर्मान्तरण करने वाला संस्कृति की दृश्टि से हिन्दू रह सकता है। 4

प.पू गुरूजी माधव सदाषिव गोलवलकर ने कहा है व्यक्ति के तीन धर्म होते है- व्यक्ति धर्म, कुलधर्म, राश्ट्रधर्म। व्यक्तिधर्म यानी उपासना पद्धति परिवर्तन से कुल धर्म और राश्ट्रधर्म परिवर्तित नहीं होना चाहिए। फिर इसाई या मुसलमान अपने नाम राम, कृश्ण, अषोक आदि न रख कर जान, थामस, अली, हसन, आदि क्यों रखते हैं। षेख और सैयद अरब की जातियां हैं। फिर भी अधिकांष भारतीय मुसलमान अपने को उनका वंषज कैसे अनुभव करते है यह समझ से परे हैं। मां बाप प्रायः उनके जो आदर्ष रहे हैं उन्हीं जैसा नाम अपनी संतानों का भी रखना चाहेंगे। रावण, कुम्भकरण, जयचंद अपने लड़के का नाम नहीं रखना चाहेंगे। अतएव सिर्फ इस्लाम धर्म के अनुयायी कोई है इसी आधार पर अपनी संतानों का नामकरण नहीं करना चाहिए। हमारे राश्ट्रपुरूशों और हमारी संस्कृति के अनुरूप ही हमें नामकरण करने चाहिए। इससे राश्ट्रीय एकता को बल मिलेगा।

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अभी हाल ही मे ईराक में युद्ध भड़का लाखो भारतीय जिनमें अधिकांष

मुस्लिम व इसाई थे भारत में ही वापस लौटे, पाकिस्तान, अरब देष या इंलैण्ड नही गये। भारत हारता है और पाकिस्तान जीतता है क्रिकेट मैच मे तो फिर फटाके नहीं फूटने चाहिए। ये बातें साधारण सी है पर इन पर षांत

मन से विचार करना चाहिए।

डा. राही मासूम रज़ा ने लिखा था-‘‘मैं एक मुसलमान हिन्दू हूं। कोई

5विक्टर इसाई हिन्दू होगा और कोई ‘मातादीन‘ वैश्णव या आर्य समाजी हिन्दू एक देष में कई धर्म समा सकते हैं परंतु एक देष में कई कौमें नहीं समा सकती। मेरे पुरखों में गालिब और मीर के साथ सूर, तुलसी और कबीर भी आते हैं।‘‘

प.पू. गुरूजी का एक संस्मरण है – एक बार एक वरिश्ठ अमेरिकी प्रोफेसर ने गुरूजी से प्रष्न किया- मुसलमान और इसाई इसी देष में है, आप उन्हें अपनों में ही क्यों नहीं समझते। उत्तर में गुरूजी ने उन्ही से उल्टे एक प्रष्न कर दिया- ‘‘मान लीजिये हमारे देष का ही व्यक्ति अमेरिका जाता

है, बसने लगता है और वहां का नागरिक बनना चाहता है। किंतु वह आपके लिंकन, वाषिंगटन, जेफरसन तथा अन्य राश्ट्रीय महापुरूशों को स्वीकार करने से इंकार करता है, स्पश्ट उत्तर दीजिये कि क्या आप उसे अमेरिका का राश्ट्रीय

कहेंगे।‘‘ उन्होने कहा नहीं।

एक ओर हम महाराश्ट्र में हिन्दू वोट बंटोरने के लिये छत्रपति षिवाजी की स्टेच्यु का अनावरण करने के लिये दौड़ पड़ते हैं, महाराणा प्रताप के वंषज जो म.प्र. में कहीं रहते हैं, उनके समर्थन को चुनावी माहौल में प्रचारित करते हैं और दूसरी ओर आक्रमककारी आततायी मुगल महिमा मंडित हों इसका वातावरण

बनाने हैं या बनने देते हैं। वोट की राजनीति का यह खेल देषहित को बलायेताक रखकर आखिर हम कब तक खेलते रहेंगे?

छद्म धर्म निरपेक्षता का चक्कर

अपने षासन काल में कांग्रेस ने हमें यही सिखाया और पढ़ाया कि कांग्रेस का और वह भी कांग्रेस के नरम दल का स्वतंत्रता आंदोलन और पं. नेहरू तथा उनके परिवार का षासन ही भारत का इतिहास है। इसके अलावा और कुछ जानने योग्य है ही नहीं। व्यर्थ में गड़े मुर्दे उखाड़ना है। कांग्रेस

ने अपने षासनकाल में पं. नेहरू के कृत्रिम राश्ट्रवाद और अनीष्वरवादी छद्म

धर्मनिरपेक्षता का जो चक्कर चलाया उसके कारण से हम गुमनाम, बिना पहचान

और भटके हुये दिषाविहीन राहगीर की भांति हो गये है

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ऐसे समय में स्वामी विवेकानन्द के इस उद्धरण का हमें स्मरण करना चाहिए

‘‘मुझे अपने पूर्वजों को अपनाने में कभी लज्जा नहीं आई। मैं सबसे गर्वीले

व्यक्तियों में से एक हूं।……..जितनी ही मैंने भूतकाल पर दृश्टि डाली यह गर्व मुझमें बढ़ता ही गया है।………तुम्हारे रक्त में भी अपने पूर्वजों के लिये उसी श्रद्धा का संचार हो जाये।‘‘ ठीक इसके विपरीत पं. नेहरू ने अपने स्वयं के बारे में कहा था कि वे घटनावष हिन्दू हैं।

पाठ्य पुस्तकों में बच्चों को गणेष का ‘ग‘ पढ़ाया जाता था तो तत्कालीन कांग्रेस सरकार को इसमें 6
साम्प्रदायिकता की झलक दिखाई दी। गधे का ग पढ़ाया जाने लगा। कहीं कहीं गमले का ‘ग‘। इसी प्रकार
उ.प्र. की कांग्रेसी सरकार ने स्व. ष्यामनारायण पाण्डे की ‘हल्दी घाटी‘ और ‘जौहर‘ कविताओं को साम्प्रदायिक करार देकर पाट्यक्रम से निकलवा दिया था। महाराणा प्रताप, छत्रपति षिवाजी, गुरू गोविन्द सिंह झांसी की रानी लक्ष्मी बाई आदि को संकट के समय अवष्य हमारी सरकार दूरदर्षन के माध्यम से याद कर लेती है। ऐसे समय वे साम्प्रदायिक नहीं रहते।

‘चाणक्य‘ दूरदर्षन धारावाहिक के सम्बन्ध में हमारी केन्द्र सरकार की असमंजसपूर्ण स्थति भी यही कहानी कहती है। देष भक्ति के गीतों को,भगवाध्वज को, हर हर महादेव के नारे को, त्रिषुल को साम्प्रदायिक करार दिया गया।

परन्तु प्रधानमंत्री जी की सूझबूझ से दूरदर्षन को सत्बुद्धि आई।

तुश्टिकरण की नीति

हिन्दू मुस्लिमों के बीच सदैव सद्भाव रहा है। परन्तु थोक वोट पाने की लालच से तुश्टिकरण की नीति अपनाये जाने से राश्ट्रीय एकता  भंग हुई है।

काष्मीर में सद्भाव था। वहां धारा 370 लागू होने से पाकिस्तानी मदद

से अलगाववाद और उग्रवाद पनपा। कष्मीर को अरबो रूपये दिये जाते हैं  पर वहां हिन्दुओं का कत्लेआम जारी है।

कलकत्ता हाईकोर्ट में जब ईस्टर्न इडन गार्डन काण्ड से सम्बन्धित एक मुस्लिम मुर्दे की लाष को पोस्टमार्टम हेतु कब्र से निकलवाया तो हजारों

मुस्लिमों ने न्यायालय का घेराव कर उसे मजहब के खिलाफ बताकर न्यायाधीश

को आज्ञा वापस लेने हेतु बाध्य कर दिया।

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तलाकषुदा महिलाओं की मानवीय समस्याओं पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को सिर्फ मजहब के कारण संसद में विधेयक पारित कर कांग्रेष सरकार ने रद्द कर दिया। विरोध में तत्कालीन मंत्री आरिफ मोहम्मद खां ने त्यागपत्र तक दे दिया था यह साहबानों प्रकरण कांग्रस की धर्म निरपेक्षता है। (नागालैण्ड़) मिंजोरम चुनाव में कांग्रेस द्वारा चुनावी घोशणा पत्र में पृथक इसाई राज्य की स्थापना का वचन दिया गया था।

विष्वनाथ प्रताप सिंह भी अपने षासन काल में इस प्रतियोगिता में षामिल हुये। मुहम्मद साहब के जन्म दिन पर बिना मांगे छुट्टी घोशित कर दिये। इमाम बुखारी के इषारों पर नाचना प्रारंभ कर दिया। कांग्रेस और मार्क्सवादी दोनों ही केरल में बारी बारी से मुस्लिम लीग को गले लगाते रहे। मुस्लिम लीग के ही इषारों पर थोक वोट पाने के लिये कांग्रेस ने अपने पिछले घोशणा पत्र में धार्मिक स्थालों की 1947की यथास्थिति रखने का वायदा किया था।

सब के लिये समान कानून

7   देष के सभी नागरिकों के लिये फिर चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान या ईसाई समान कानून होने चाहिए पर हमारे यहां यह बात नहीं है इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री जान मेजर ने अपने देष में मुसलमानों द्वारा मुस्लिम संसद बनाये जाने की मांग पर कहा कि, ‘‘जिसे विषिश्ट आकार चाहिए वह इंग्लैण्ड छोड़ कर चला जाए‘‘ परन्तु हमारे नेता इतनी दो टूक स्पश्ट बात नहीं कहना चाहते। वोट का चक्कर जो है।

राम जन्म भूमि, कृश्ण जन्म भूमि पर भव्य मंदिर बनना चाहिए। यह धार्मिक

नहीं राश्ट्रीय अस्मिताका सवाल है। हिन्दू मुस्लिम एकता राश्ट्रीय एकता का सवाल है। सच पूछा जाये तो हिन्दू मुस्लिमों के बीच इस संबंध में विवाद नहीं है। यदि कोई विवाद है तो वह पैदा किया गया है। एक मुष्त वो पाने की ललक ने, तुश्टीकरण की नीति ने भड़काऊ और टकराव का वातावरण बना दिया है।

8

 

 

 

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07

हमारी तो यह धारणा है कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण का प्रयास भाजपा के अलावा अन्य किसी ने किया होता तो यह विवाद गहराया नहीं होता। राम और कृश्ण ऐतिहासिक महापुरूश, राश्ट्र के गौरव हैं। रामायण, महाभारत को भुलाकर राश्ट्रीय एकता की बात करना बेमानी है। महाभारत के बारे में वेद व्यास ने लिखा है ‘‘संसार में जो जानने योग्य है वह सब इस पुस्तक में है और जो नहीं है, वह जानने योग्य ही नहीं है।‘‘
9कुछ लोगों को रामायण और महाभारत कपोल कल्पित,राम और कृश्ण काल्पनिक पात्र लगते हैं। उन्हें यह पूछते हुए षर्म नहीं आती कि ‘राम जन्म भूमि‘ में ही और कृश्ण ‘कृश्ण जन्म भूमि‘ में ही जन्म लिये थे इसके क्या प्रमाण हैं। यदि कोई उन्हीं से पूछे कि आपने स्वयं को जन्म लेते हुये क्या देखा था? यदि नहीं देखा था तो फिर कैसे अपनी मां को मां और बाप को बाप कहते हैं। ईष्वर एक अदृष्य षक्ति हैं। फिर भी सारा संसार उसे क्यों मानता है? आखिर आस्था, विष्वास और सदियों से चली आ रही परम्पराओं से बढ़ कर सत्य कौन सा होता है?

राम और कृश्ण का विरोध सभी मुस्लिमों में नहीं है। इस पुस्तक में कानपुर के अंसार कबरी जी के दोहे एवं गजलें हम प्रकाषित कर रहे हैं। उन्होंने संस्कृत में एम.ए. किया है। उन्होंने हमें जो पत्र लिखा है उसका प्रारंभ उन्होंने राम राम से किया है। इसी सम्पादकीय में हम स्व. राही मासूम रजा के उद्धरण दिये हैं। उन्होंने मरहूम इस्मत चुगताई के साथ उर्दू लिपि को देवनागरी में बदलने का प्रयास भी किया पर ‘‘कट्टरता‘‘ ने उनके प्रयास को सफल नहीं होने दिया। देवी रेहाना तैय्यब जी गुजरात की थी, अपने पत्रों में भी ‘‘किषन जी की बंसरी‘‘ का उल्लेख करती थी। उन्होंने भी इसी संबंध में 1947में गांधी जी को एक पत्र लिखा था।

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परन्तु मुष्किल यह है कि ऐसें लोगों को ‘कट्टरता‘ काफिर की संज्ञा दे देती है। वे हिन्दू हो गये हैं कह दिया जाता है। क्या ऐसे लोग साम्मप्रदायिक हैं?

इसी वर्श कुछ दिनों पूर्व रायपुर के समाचार का ही उल्लेख सांकेतिक दृश्टि से हम कर रहे हैं। बागबहरा तहसील के नर्रा ग्राम में धार्मिक आयोजनों

में सभी धर्मानुयायी मिल जुल कर भाग लेते हैं। नजब खां, मेहताब खां, तथा अम्मो बी अपने जीवन के अंत समय तक राम के अनन्य भक्त रहे। इस प्रकार के एक नहीं अनगिनत उदाहरण हैं।

10   रामभक्ति और कृश्ण भक्ति हिन्दू मुस्लिमों के बीच सेतु का काम करती रही है। वोटों की राजनीति ने इस सेतु पर गाज गिराई है। 1238 में जन्में हजरत

निजामुद्दीन औलिया सूफी संत हिन्दी के कवि और अमीर खुसरों के गुरू थे। रही, रसखान, रसलीन, मुबारक मधनायक,पेनी (सैयद बरकत), मीर जलील, रहमत आदि ऐसे महान कृश्ण भक्त कवि हुये जिनके जितनी प्रषंसा की जाये उतनी कम है‘‘ इन मुसलमान हरिजन पै कोटिन हिन्दून वारिये।‘‘

फिर प्रष्न उठता है कि आखिर अब उस प्रकार का वातावरण अधिक क्यों देखने में नहीं आ रहा है। इस पुस्तक में कुछ स्थानों पर मोहम्मद इकबाल की कविताओं की कुछ पंक्तियों छपी हैं। उन्होंने हिन्दुस्तान और हमारी संस्कृति सभ्यता का जी भर कर बखान किया है। परन्तु उसके बाद आखरी में उन्होने बिलकुल पलटी मार दी और इस महान कवि ने बाद में लिखा-

‘‘मुस्लिम हैं हम वतन हैं सारा जहां हमारा‘‘ हम जरा सोचें वे कौन सी परिस्थितियां थी? इसी कारण हमारा कहना है कि मुसलमान राश्ट्र भक्त

नहीं हैं यह कहना गलत है। फतवों का डर बहुतों को राश्ट्रभक्ति के मार्ग से हटने को उन्मुख करता है। हमें चाहिए कि हम उन परिस्थियों को जनता के सामने लायें।

इसी तर्ज पर कम्युनिश्ट भी ‘‘मास्को इज दी कपिटल आफ वर्ल्ड‘‘ गाते रहे। एक मित्र (कम्युनिट) देष दूसरे देष पर आक्रमण करे तो वहां के मित्रों (कम्युनिटों) को चाहिए कि वे मित्र देष की सहायता करें। आज इन सिद्धानों की ध्वज्जियां उड़ गई है। सद्दाम हुसैन का क्या हश्र हुआ हम देख रहे हैं। बिहारी मुसलमानों पर पाकिस्तान में कितने अत्याचार हो रहे हैं क्या

हमारे मुस्लिम बंधु नहीं देख रहे हैं।

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09

अपने प्रति आत्म ग्लानि क्यों?

परर विभवेशा दरोपि न कर्तव्यः

पर विभेशादरोपि नाष मूलम्।

अर्थात परकियों के वैभव के प्रति आदर बुद्धि रखने से उनके अंधानुकरण

की प्रवृत्ति निर्मित हो कर स्वत्व की हानि होती है। स्वत्वहीन समाज का सहजता से विनाष होता है। कवि डा. उदय प्रताप सिंह की एक छोटी सी कविता के भाव

हैं-‘‘बेचारा सूरज पूरब से उग कर उूबने को पष्चिम में चला। इसकी एक दो झलक हम दे रहें हैं।

उद्घाटन समारोहों में नारियल फोड़ना, दीप प्रज्जवलित करना साम्प्रदायिक सझते हैं और फीता काटने की पाष्चात्य परम्परा को असाम्प्रदायिक!

प्रसिद्ध साहित्यकार प्रभाकर माचवे अमेरिका भ्रमण कर लौटे तो अपने संस्मरण सुनाते हुये उन्होनें कहा था कि हमारे यहां के अखबारों में षादी बिवाह के संबंध में जो विज्ञापन छपते हैं उसमें सर्वप्रथम आवष्यक षर्त वर-वधू के लिए होती है, कि वह गौर वर्णीय हो। इन विज्ञापनों को पढ़कर अमेरिका के लोग हंसते हैं। वे बिचारे तो हजारों रू. रोज खर्च करने सांवला होने सूर्य की किरणों का स्नान करने भारत आते हैं।

यूरोपियन स्त्री-पुरूश के सुनहले भूरे बालों की ओर हम सहसा आकर्शित हो जाते हैं और अपने बालों को भी खिजाब लगाने लगते हैं। जबकि स्काटलैंड में नये वर्श के आगमन पर लाल बार्लो वाले स्त्री पुरूश को देखना अषुभ और काले बालों वाले स्त्री पुरूश को देखना षुभ माना जाता है।

स्वदेषी भावना

अन्तर्राश्ट्रीय मुद्रकोश से हमारे केन्द्रीय वित्त मंत्री उनकी षर्तो पर ऋण लिये जाते रहे हैं और हर क्षेत्र में बहुराश्ट्रीय कंपनियों के भारत प्रवेष के लिये द्वार खोलते रहे हैं। इसकी भी चर्चा यहां जरूरी है। हमारी सरकार इस सिद्धांत पर चल रही है कि जबतक जीवो खुषी से जीवो. उधार लो और घी पीयो।

हम इतनी जल्दी भूल गये कि ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रवेष भारत में व्यापारिक कंपनी के नाते ही हुआ था जिसने कि भारत को 200 वशों तक गुलाम बनाये रखा। फलों का व्यापार करने वाली एक बहुराश्ट्रीय कंपनी ने चिली का तख्ता ही पलट दिया था। भारत में बहुराश्ट्रीय कंपनियों के हर क्षेत्र में प्रवेष से देष की सूरक्षा व एकता को खतरा है ही, इसके अलावा वे अपने प्रचार-प्रसार

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से अंधाधुंध कमायी पूंजी भी विदेष भेजेंगे। हिन्दुस्तान लीवर गत वर्शो से प्रतिवर्श 15 से 17 करोड़ रूपया इंग्लैण्ड भेजते रहा है।

अब हमारे सामने एक ही उपाय बचता है। भारत की जनता स्वदेषी की राह पर चल पडे़ तो बहुराश्ट्रीय कंपनियों को हम उल्टे पांव वापस जाने के लियो बाध्य कर सकते हैं।

एकता यात्रा और उसके बाद……….

11भाजपा अध्यक्ष डा. मुरली मनोहर जोषी की कन्याकुमारी से कषमीर तक की एकता यात्रा का सफल समापन हो गया है। आरोप प्रत्यारोप के दौरान अब बंद होने चाहिए और आगे की ओर देखना चाहिये। प.पू. गुरूजी ने अपना संपूर्ण जीवन अपने निजी सहायक बाबा थत्ते के साथ रेल यात्रा करते हुये  भारत के जन जन को बच्चे बच्चे को जागृत करने में बिताया। वे प्रायः कहा करते थे रेलगाड़ी का डिब्बा ही मेरा घर है। एक प्रष्न के उत्तर में  उन्होंने कहा था – अभी तो पूरे भारत के ही दर्षन नहीं हुये हैं तो विदेष यात्रा का प्रष्न ही कहां। करोड़ों रूपये विदेष यात्रा में पानी की तरह बहाने वाले हमारे मंत्रियो और नेताओं को उनके जीवन से षिक्षा ग्रहण कर आवष्यक हो तभी विदेष यात्रा करना चाहिए और बांकी बचे समय को दूर दराज गांवों को देखना समझने में लगाना चाहिए।

आज भी ऐसे गांव हैं जहां स्वतंत्रता के बाद आज तक कोई नही पहंुचा है। एक उदाहरण हम दे रहे हैं। म.प्र. की राजधानी भोपाल से मात्र 1 कि.मी. दूर बंदीखेड़ी ग्राम में आजादी के बाद पहली बार (तत्कालीन) राज्य कृशि मंत्री लक्ष्मीनारायण षर्मा पहंुचे थे। ऐसे गांव एक नहीं अनेक हैं। आखिर उनकी सुध कौन लेगा?

राश्ट्रीय एकता के लिये आवष्यक है कि हम संपूर्ण राश्ट्र को एक रूप में देखें। हम प्रायः देखते हैं कि यदि कोई नेता बनता है तो सारे नियमों को बलाये ताक रख कर अपने क्षेत्र के, अपनी पार्टी के अपनी जाति बिरादरी के लोगों  की भरती सरकारी नौकरियों में करना प्रारंभ कर देता है। वे अपने ही क्षेत्र मे बड़े बड़े कारखाने आवष्यक विषेशताएं उपलब्ध न होने के बावजूद खुलवाने  प्रारंभ कर देता है। प्रधानमंत्रीतक इस प्रकार के आरोपों से अपने

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आपको बचा नहीं पाते हैं। बदले की भावना से कार्य करने लग जाते हैं। अकारण ही अपने विरोधीयों को सताना प्रारंभ देते हैं। हर प्रकार के हथकण्डे अपना कर दोनों हाथों से धन बंटोरने में लग जाते हैं। चाटूकार असामाजिक तत्वों की फौज अपने इर्द गिर्द खड़ी कर लेते हैं। वे भूल जाते हैं कि यह वहीं जनता जनार्दन है जो उन्हें धूल भी चटा सकती है।

इंदिरा, राजीव तक को सबक सिखाने षक्ति जिस जनता में हैं उससे बड़ा प्रजातन्त्र में कोई नहीं है। अतएव अन्त में नेताओं मंत्रियों से हमारा आग्रह है कि वे जनहित राश्ट्रहित के मार्ग पर चलें। यदि ऐसा हुआ तो राश्ट्रीय एकता भी कायम रहेगी।

वन्दे मातरम्

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Prastavanaa [Preface]

Rashtriya Ekta : Cover Pages

Anukram : Contents

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Prastavanaa, Preface, Rashtriya Ekta Book

’’राश्ट्रीय एकता’’ का यह द्वितीय संस्करण 2015 में प्रकाषित हो रहा है। प्रथम संस्करण जनवरी 1992 में प्रकाषित हुआ था। इस पुस्तक में प्रकाषनार्थ जिन महानुभावों के लेख,कविताएं एवं संदेष हमें प्राप्त हुए थे उन सभी के हम आभारी हैं ।

आदरणीय बलराज मधोक जी जैसे महान विभूति का लेख प्रकाषित करते समय हमें एक विषेश प्रकार के गौरव की अनुभूति हो रही है। उन्होंने अपने पत्र में लिखा था कि कष्मीर मामले के वे जीवित गवाह हैं और इस विशय पर वे अपना लेख टाइप किये हुए की अपेक्षा हस्तलिखित ही प्रेशित करना उचित समझे। इसका उल्लेख भी पत्र में उन्होंने किया। उनके प्रत्येक षब्द में उनकी महानता की झलक के दर्षन कर हम गौरव का अनुभव करते हैं। अपेक्षा है कि हम सब उनकी देषभक्ति से प्रेरणा प्राप्त करेंगे। आदरणीय बलराज मधोक भाजपा से पूर्व की जनसंघ के अध्यक्ष रह चुके हैं। अ.भा. विद्यार्थी परिशद,जम्मू की प्रजा परिशद एवं जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं। रा. स्व. संघ से एवं षिक्षा जगत से उनका निकट का संबंध रहा है।

कवि एवं स.पा. सांसद उदय प्रताप सिंह प्रकृति को माध्यम बनाकर जीवन की सच्चाइयों को अपनी कवितों में उतारते हैं। प्रकाषनार्थ कविता प्रेशित करते हुए उन्होंने पत्र में लिखा था कि वे भाजपा की नीतियों से असहमत हैं और समाजवादी पार्टी के सांसद हैं। परन्तु राश्ट्रीय एकता एक एैसा विशय है जिस पर हमें व्यक्तिगत एवं संस्थागत बातों से ऊपर उठ कर सोंचने और करने की आवष्यकता है।

कवि के उक्त षब्दों की झलक आज हम अपने अधिकांष नेताओं में अलग प्रकार से देखते हैं। वे भी समय समय पर एक हो जाते हैं परन्तु राश्ट्र की समृद्धि और राश्ट्रीय एकता की अपेक्षा अपने अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिये अधिक।

छत्तीसगढ़ के वरिश्ठ पत्रकार श्री रमेष नैयर का लेख ‘‘गीताः विष्व समुदाय का जीवन-षास्त्र‘‘ भी राश्ट्रीय एकता की श्रृखला को मजबूती प्रदान करता है। रामकृश्ण मिषन  छत्तीसगढ़ रायपुर के प्रमुख  स्वामी सत्य रूपानंद जी महाराज इस लेख की प्रषंसा करते हुए लेखक को आषीर्वाद प्रदान कर चुके हैं। उल्लेखनिय है कि इस पुस्तक के संपादक प्रेमेन्द्र अग्रवाल के भी आत्मीय संबंध स्वामी जी से रहे हैं जब वे विद्यार्थी जीवन में संघ के स्वयंसेवक रहते हुये विवेकानंद आश्रम की स्थापना रायपुर में करने हेतु संघर्शरत थे।

श्री गुमान मल लोढ़ा राजस्थान एवं असम के मुख्य न्यायाधीष रह चुके हैं। आपके अनेक निर्णय ऐतिहासिक रहे हैं। सुप्रसिद्ध क्रिकेट खिलाड़ी श्री चेतन चौहान अमरोहा उ.प. से भाजपा के सांसद रह चुके हैं। कवि ब्रजभूशण सिंह आपके मांमा हैं ।

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रायपुर के पूर्व जिलाधीष एवं म.प्र. के पूर्व सचिव श्री सुषील चन्द्र वर्मा के विचार भी इसमें प्रकाषित हैं। युवकों के प्रेरणा स्रोत स्वर्गीय दिलीपसिंह जूदेव जी के प्रयासों से सरगुजा क्षेत्र के हजारों आदिवासी जो इसाई मिषनरियों के छलकपट से इसाई बने थे पुनः अपने हिन्दूधर्म में घर वापसी मुहिम के तहत लौटे हैं। हिन्दू हित के लिए सदैव सब कुछ करने को तत्पर रहे रायपुर के स्वर्गीय कुन्तल  कुमार चौहान एडव्होकेट की चर्चा जूदेव जी के साथ होना स्वाभाविक है।

रायगढ़ के वर्तमान विधानसभा सदस्य श्री रोषन लाल अग्रवाल का अपने क्षेत्र के लोगों के हित के लिए सदैव जूझते रहना स्वभाव बन चुका है।

माखनलाल चतुर्वेदी राश्ट्रीय पत्रकारिता वि.वि. भोपाल के पूर्व महानिदेषक श्री राधेष्याम षर्मा ‘युगधर्म‘ दैनिक एवं अंग्रेजी दैनिक ‘‘ट्रिव्यून‘‘ से भी जुड़े रहे हैं।

छद्म धर्म निरपेक्षता के प्रबल विरोधी कानपुर के अंसार कंबरी जी की राम पर लिखी कविताएं सम्पूर्ण देया में चर्चित हैं। सर्वश्री रामेष्वर षुक्ल अंचल, माणिक वर्मा,चन्द्रसेन विराट,एवं चंन्द्रहास षुक्ल म.प्र. के कवि हैं। डा. हरिहर बख्ष सिंह म. प्र. साहित्यि सम्मेलन के अध्यक्ष रह चुके हैं। हल्दीघाटी पर लिखा उनका महाकाव्य ‘युगधर्म‘ दैनिक में धारावाहिक रूप से प्रकाषित हो चुका है।

इस पुस्तक के सम्पादक प्रेमेन्द्र अग्रवाल की प्रेरणा से मैं ‘एकता-यात्रा‘ में स

म्मिलित हो काष्मीर जा सका और ‘राश्ट्रीय एकता‘ पुस्तक का प्रकाषन जनवरी 1992 में कर सका। द्वितीय संस्करण अब 2015 में कामर्षियल सर्विसेज् रायपुर द्वारा राश्ट्रीय एकता के पवित्र कार्य में अपना योगदान देने हेतु किया जा रहा है। इसकी प्रेरणा इस संस्थान को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा उद्घाटित ‘एकता की दौड़ (त्नद वित न्दपजल) से प्राप्त हुई है।

-राजेष अग्रवाल

पूर्व उपाध्यक्ष भा.ज.युवा मोर्चा रायपुर जिला

 

cell .978.81.930512.2.1

 

Anukram : Contents

Anukram, Contents, Rashtriya  Ekta Book

01 Preface

01 सम्पादकीय                                                                         प्रेमेन्द्र अग्रवाल         01-11

02 भारत की एकता और संविधान की धारा 370                          प्रो. बलराज मधोक     12-17

03 एकता गीत (कविता)                                                             उदय प्रताप सिंह        18-19

04 गीता: विष्व समुदाय का जीवन-षास्त्र                                     रमेष नैयर                                20-24

05 जिसका हिंदुस्तान है, उसका है कष्मीर  (कविता)                   अंसार कंबरी              25-26

06 गजल व संदेष                                                                                                      27

07 हमारी सांस्कृति विरासत और आज की व्यवस्था                    सुषील चन्द्र वर्मा       28-34

08 होंगे रचना मग्र वही विद्रोही बागी (कविता)                             रामेष्वर षुक्ल ‘अंचल‘ 35

10 लाल चौंक पर तिरंगा कैसे फहरा                                    जस्टिस गुमानमल लौढ़ा 37-40

11 मचल उठा है एक एक जन एक सूत्र में बंधने को      (कविता)   चन्द्रहास षुक्ल          41

13 एकता यात्रा के दौरान श्री नरेन्द्र मोदी                                                                     43-45

14 जहां हुए बलिदान मुखर्जी वह कष्मीर हमारा है                       चेतन चौहान             46-47

15 देषभक्ति बन अंगार दहकी व व्यंग-गजल (कविता)                ब्रजभूशण सिंह गौतम

मानिक वर्मा              48

16 राश्ट्र को एक भारतीय आत्मा की दृश्टि से देखें                       राधेष्याम षर्मा           50-53

17 कविता                                                                                                                 54

18 गमला संस्कृति व एकता यात्रा                                                                               55

19 भगवान षंकर मुस्लिमों के प्रथम पैगंबर एकता के प्रतीक                                         56-58

20 एकता-यात्रा पर संस्मरण                                                      दिलीप सिंह जुदेव      60-63

21 हम सब हिन्दुस्तानी (कविता)                                                               चन्द्रसेन ‘विराट‘    64

22 प्राचीन भारतीय साहित्य में राश्ट्रीयता के स्वर                                                        65-68

23 हिन्दी को अपनायें                                                                राधा अग्रवाल            69

24 संविधान की धारा 370 देषद्रोह पूर्ण है                                     कुन्तल कुमार चौहान 70-72

25 पृथ्वीराज चौहान की अस्थियांः भारत का वज्र-सम्मान

वापस लाये                                                                                                            73-78

26 राश्ट्रीय एकता में नारी का महत्व                                           लक्ष्मण प्रसाद वर्मा   79-80

Rashtriya Ekta : Cover Pages

 

rastrya-ekta-coverराष्ट्रीय एकता

Anukram : Contents

सम्पादक

प्रेमेन्द्र अग्रवाल

 

 

@ Copy Right

 

कामर्षियल सर्विसेज स्टेष्नरी हाऊस सिंधी स्कूल के पिछे,रामसागर पारा,रायपुर,492001 फोन नं. 0771-4075078

 

 

मुद्रक

साधूराम अग्रवाल, बी. ई. (मेके), डिप्लोमा बी.एम.

अषोक प्रेस, स्टेषन रोड, रायपुर छ.ग.

ISBN- 978-81-930512-2-1

—————————————————————————————-

प्रकाषक    –           कामर्षियल सर्विसेज

स्टेष्नरी हाऊस

सिंधी स्कूल के पीछे,रामसागर पारा

रायपुर, छ.ग. 492001

सर्वाधिकार –        सुरक्षित

संस्करण                 –            द्वितीय,2015

भाशा         –           हिन्दी

पृश्ट           –           122

अनुवाद    –           श्री प्रेमेन्द्र अग्रवाल

मूल्य      –              150 रू.

साईज       –           9‘‘ग5ण्5श्

हार्डबोर्ड कवर

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YouTube: PM Narendramodi at Bloomberg Economic Summit in New Delhi: Highlights

YouTube, PM Narendra Modi, Modi at Bloomberg Economic Summit,  Bloomberg Economic Summitin New Delhi, Highlights

PM Modi at Bloomberg Eco Summit
* We have increased the limits for foreign investment in stock exchanges and have allowed them to be listed: PM Modi at Bloomberg Eco Summit
* We are focusing on creating durable assets that benefit the population rather than touts:
* Under new Hydrocarbon Exploration Licensing Policy, there will be pricing & marketing freedom & transparent revenue-sharing methodology
* My goal is reform through transform. Administration reform is a start: PM at Bloomberg Eco Summit
* Large share of our population depends on agriculture. Doubling farmers incomes is our plan & will have strong benefits for other sectors
* Net foreign direct investment in the 3rd quarter of the current financial year was an all-time record
* We have reduced the deficit even while increasing capital expenditure
* India is 1 of world economys brightest spots with low inflation, low balance of payments current

#WATCH: In Kharagpur WB Narendra Modi pauses his speech during Azaan: 20 Highlights of PM’s speech

#, PM Narendra Modi In Kharagpur,  Kharagpur WB, Modi pauses his speech, During Azaan, Bhashan, Modi in Public meeting

Azaan khatm hone ke baad PM @narendramodi punah bolanaa prarambha kiye:

जिस दौरान पीएम मोदी भाषण दे रहे थे उसी समय पास की एक मस्जिद से अजान की आवाज़ आई. पीएम मोदी ने अजान की आवाज सुन अपना भाषण कुछ देर के लिए रोक दिया.

इस दौरान रैली में कार्यकर्ता थोड़ा शोर कर रहे थे पीएम ने उन्हें इशारे से शांति बनाए रखने को कहा. अजान खत्म होने के बाद पीएम ने दोबारा बोलना शुरू किया.

* Azaan chal rahi thi, hamare kaaran ki kisi ki puja, prarthna mein takleef nahi honi chahiye isiliye maine kuchh pal viraam le liya
* Azaan(call to prayer) was on, there shouldn’t be any problem in anyone’s prayers because of us, that is why I paused for few moment

PM Modi at a Public Meeting in Kharagpur, West Bengal

* Have you heard of any corruption since we have come to power?- PM Modi in Kharagpur (WB)
* Pahle Saradha ab Narada. Saradha se Narada tak puri ki puri leadership camera ke saamne agla hafta kab doge
* If MUDRA scheme would have been initiated earlier, Saradha scam would have not happened-
* Congress and Communists have challenged the wisdom of Bengal and Bengal can not forgive people who challenge wisdom of Bengal
* Congress and Communists are wrestling for power in Kerala and have joined hands in West Bengal
* There was a time when Bengal was capital of industries, Left broke its back and this govt buried it
* Industries have closed down but one industry is flourishing, industry to build bombs
* Arey bhooka rehna pasand karenge lekin janta ke jeb se ek rupayee chori nahi karenge-
* I have 3 point agenda that is development, development at a fast pace and development from all sides-

 

* In these polls only think of one thing and that is the growth of West Bengal. Nothing else should matter: PM @narendramodi in Kharagpur
* Congress and Left are fighting in Kerala and are friends in West Bengal. This is insult to the pride of people of WB:
* Congress and Left should have the courage to say we are opportunist and we are bothered only about the chair
* Didi also likes Congress & Left getting together. She says if there is any enemy of West Bengal it is BJP:
* All these three parties are together & they are against the BJP. I want to seek your support for growth of West Bengal:
* BJP Karyakartas are beaten and jailed. Have you heard of Congress-Left protesting against the state government. That’s why they fear BJP
* Where did the change come in last 5 years! It came in the nature of the CM. She stopped bothering about people:
* Yes all industry has shut but the industry of making bombs is quite alive. Why is this happening:
* Centre gives rice at affordable rates so that poor get food. But Didi says it was I who gave the rice

March 27, 26, 25 of 2016: twitter.com/newsanalysisind

Twitter March 27, Tweets March 26, NewsanalysisindaMarch 25 of 2016, Newsanalysisind

newsanalysisind ‘Jehadis’ were a part of ultra-Leftmovements at JNU, HCU: @arunjaitley @narendramodiwww.firstpost.com/india/jehadis-wer…twitter.com/newsanalysisind/status/…16 hours ago from Twitter Web Client

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newsanalysisind Why does every one flow tears in Hyd butnot in Delhi Narag’s residence?www.newsanalysisindia.com/post/why-…twitter.com/AmiteshK01/status/71395…6 hours ago from Twitter Web Client

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newsanalysisind DrNarangMurder:In FIR not a single nameof accused @BJPRajnathSingh @HMOIndia @narendramoditwitter.com/newsanalysisind/status/…pbs.twimg.com/media/Ceh58qDWEAEhC2f…7 hours ago from Twitter Web Client

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newsanalysisind @Brain_hunt Why does every one flowtears in Hyd but not in Delhi Narag’swww.newsanalysisindia.com/post/why-…pbs.twimg.com/media/CefAGFZW4AEvlfQ…20 hours ago from Twitter Web Client

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newsanalysisind 6 people followed me // automaticallychecked by fllwrs.com21 hours ago from fllwrs

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newsanalysisind Condolence meet on Dr Narang killing byAAP jhopdiwalas: Slogan GO BACK against Satyendra Jain toride in his car:: Sudarshan news26 Mar from Twitter Web Client

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newsanalysisind 2 students younger brothers of Rahul-Kanhaiya arrested for posting pro-Pak slogans,released:zeenews.india.com/news/india/two-st…pbs.twimg.com/media/CeeDKY8W4AA4Wvi…26 Mar from Twitter Web Client

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newsanalysisind Congress rebels accuse Harish Rawat ofhorse-trading:: @UttarakhandBJPzeenews.india.com/news/uttarakhand/…26 Mar from Twitter Web Client

newsanalysisind PDP chief spokesman Naeem Akhter toendorseJitendraSingh @PMOIndia views said No differenceswith BJP: PDP: @jkpdp www.tribuneindia.com/news/jammu-kas…26 Mar from Twitter Web Client

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newsanalysisind Modi follows Kejri , Shatru, Rahul etcmeans now their hated religious caste divide tweets would bein PM data base: www.india.com/hindi-news/india-hind…26 Mar from Twitter Web Client

newsanalysisind It means Thaoor accepts that for BJP thisseat is win-able:indianexpress.com/article/india/ind…twitter.com/ANI_news/status/7136417…26 Mar from Twitter Web Client

newsanalysisind BJP’s catchphrase in Bengal: Saradha toNarada: @bjpbengal @bjpbengaloffice @BJPSamvadWBtimesofindia.indiatimes.com/electio…twitter.com/newsanalysisind/status/…26 Mar from Twitter Web Client

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newsanalysisind BJP hits back at Cong for running downSavarkar: @JayHinduRastramtimesofindia.indiatimes.com/india/B…www.newsanalysisindia.com/post/trai…pbs.twimg.com/media/CedqcCJXIAA3U3m…26 Mar from Twitter Web Client

newsanalysisind नाम तिनसुकिया पर यहां दुखियाही दुखिया नजर आते:www.newsanalysisindia.com/post/tins… @narendramodi@SanojKPareek @BJPAssam2016 @nirajntsh@narendrapjoshi26 Mar from Twitter Web Client

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newsanalysisind PPP to make law against forcedconversions: Bilawal: www.thenews.com.pk/print/107859-PPP… twitter.com/newsanalysisind/status/…26 Mar from Twitter Web Client

newsanalysisind Bilawal Bhutto Zardari if a Muslim canbecome president in India,why can’t someone from theminorities do so in Pak? www.thenews.com.pk/print/107859-PPP…26 Mar from Twitter Web Client

newsanalysisind Just before starting his campaign followerswere about 6000… twitter.com/TheEconomist/status/713…26 Mar from Twitter Web Client

newsanalysisind Why did Nehru kidnap Feroze Gandhi’swife? Spiritual Marriage vs vs Spiritual love:www.newsanalysisindia.com/post/Why-…twitter.com/noconversion/status/713…26 Mar from Twitter Web Client

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newsanalysisind I Won’t Say BharatMataKiJai: AsaduddinOwaisi family knot with GandhiFamily: @smritiirani@RSS_Org @DrMohanBhagwatpbs.twimg.com/media/Cecj_vpWQAACwkq…26 Mar from Twitter Web Client

newsanalysisind @jihindu @GJ12ANKIT @himantabiswa@malviyamit @sarbanandsonwal @rammadhavbjp@bjpassampradesh #CongAIUDFNexustwitter.com/newsanalysisind/status/…25 Mar from Twitter Web Client

newsanalysisind New Delhi denies any govt links of retiredIndian naval officer in Balochistan: www.business-standard.com/article/c…twitter.com/anilkapur_/status/71337…25 Mar from Twitter Web Client

newsanalysisind Can Mohammedan Law & IndianConstitution? ManishTewari tweeted:@narendramodi@AmitShah @VHPsampark @ShahnawazBJPpbs.twimg.com/media/CeZzcUpUYAAlHpL…25 Mar from Twitter Web Client

newsanalysisind Gogoi-Mamta-Kejri-Nitish politicians’ gangfor enrollingJihadists Bangladeshi as voters:twitter.com/newsanalysisind/status/…twitter.com/WakeMe_Up/status/713350…25 Mar from Twitter Web Client

newsanalysisind No chance now foreign funded anti-national NGOs, so now bribe in this way: @narendramodiwww.abplive.in/india-news/delhi-cm-…twitter.com/newsanalysisind/status/…25 Mar from Twitter Web Client

newsanalysisind Dhundho tao jaane? Kanhaiya, Kejri,Rahul hided but in which Bangladeshi hut? They flow faketears for Hyd-Rohit.. twitter.com/newsanalysisind/status/…25 Mar from Twitter Web Client

newsanalysisind Dr Murder: FIR should be filed againstKejri & other vote bankers: Bachche hain galtiho jati hai,garib aurat se bhi?www.abplive.in/india-news/dentist-b…25 Mar from Twitter Web Client

newsanalysisind #CongAIUDFNexus Assam CongressMedia Chief joins BJP? BJP hires group of IITians to run pollcampaign in Assam: www.catchnews.com/politics-news/a-g…25 Mar from Twitter Web Client

newsanalysisind Read LifSstory of VeerSavarkar@smritiirani @dr_maheshsharma @goutamprasadbjp@AssamElection16 @ChunniBabu_ @RSS_Orgpbs.twimg.com/media/CeZi7Q8UYAAm0ce…25 Mar from Twitter Web Client

newsanalysisind Savarkar’s escape to leap into the ocean@nirajntsh @SanojKPareek @Sid4india @rajattwitteswww.savarkar.org/en/centenary-epic-…pbs.twimg.com/media/CeZfCzRUEAESlN_…25 Mar from Twitter Web Client

newsanalysisind FIR must be filed against Aiyr political guruof Gandhi family who stole a plaque with a poemcommemorating Savarkarwww.newsanalysisindia.com/post/Afte…25 Mar from Twitter Web Client

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